Thursday, June 13, 2024
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अगस्‍त क्रांति: आंदोलन में भाग लेने के लिए किन्‍हें थी गांधी जी की मनाही | – News in Hindi

9 अगस्‍त भारतीय स्‍वतंत्रता संग्राम के इतिहास का वह ऐतिहासिक दिन है जब देश ने एक हो कर हुंकार भरी थी- क्विट इंडिया, अंग्रेजों भारत छोड़ो. ब्रिटिश साम्राज्‍य को उखाड़ फेंकने की जो कोशिश कई-कई आंदोलनों के जरिए की जा रही थी वह अंतत: उस आंदोलन पर आ कर टिक गई जिसे में अगस्‍त क्रांति कहते हैं. गांधी जी ने ‘करो या मरो’ का नारा देकर अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए पूरे भारत के युवाओं का आह्वान किया था.

साल था 1942 और स्‍थान था मुंबई का गोवालिया पार्क जिसे बाद में अगस्‍त क्रांति मैदान नाम दिया गया. इस आंदोलन की नींव 4 जुलाई 1942 को पड़ी थी जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रस्ताव पारित कर निर्णय लिया कि कि दूसरे विश्‍व युद्ध के समय किया वादा पूरा नहीं होता है और अंग्रेज भारत छोड़ कर नहीं जाते हैं तो देश भर में नागरिक अवज्ञा आंदोलन किया जाएगा. तथ्‍य बताते हैं कि इस निर्णय पर कांग्रेस में दो मत थे. कांग्रेसी नेता चक्रवर्ती गोपालाचारी इसके पक्ष में नहीं थे. विरोध करते हुए उन्‍होंने पार्टी छोड़ दी. वहीं सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, अशोक मेहता और जयप्रकाश नारायण ने इस प्रस्‍ताव का समर्थन किया. मुस्लिम लीग, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और हिंदू महासभा इस आंदोलन में कांग्रेस के साथ नहीं आए.

गांधी जी द्वारा तय दिशा के अनुसार आंदोलन की रूपरेखा बनी और 8 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ शुरू करने का निर्णय ले लिया. 9 अगस्‍त की सुबह से ही कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारियां शुरू हो गईं मगर गांधी जी के भाषण से मिली ऊर्जा पूरे देश में फैल गई और लगभग पूरे देश ने एक स्‍वर में कहा, अंग्रेजों भारत छोड़ो.कांग्रेस समिति में दिया गया गांधी जी का भाषण इस‍ लिहाज से बेहद महत्‍वपूर्ण है. गांधी जी ने अपने भाषण में कुछ बातें साफ करना चाही थीं और कहा था कि कई लोग मुझसे यह पूछते है की क्या मैं वही इंसान हूं जो मैं 1920 में हुआ करता था, और क्या मुझमे कोई बदलाव आया है. मैं आपको भरोसा दिलाता हूं कि मैं वही मोहनदास गांधी हूं जैसा मैं 1920 में था.

गांधी जी ने 1920 का जिक्र इसलिए किया क्‍योंकि 1 अगस्‍त 1920 को असहयोग आंदोलन आरंभ हुआ था. इसके पहले 1919 में जलियांवाला बाग हत्‍याकांड हो चुका था. कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में 4 सितंबर 1920 को आंदोलन का प्रस्ताव पारित हुआ. जनता से आग्रह किया गया था कि वे स्कूलो, कॉलेजो और न्यायालय न जाएं तथा अंग्रेजों का कर न चुकाएं. सभी अंग्रेज सरकार के साथ असहयोग करें. गांधी जी का मानना था कि यदि असहयोग का ठीक ढंग से पालन किया जाए तो भारत एक वर्ष के भीतर स्वराज प्राप्त कर लेगा. लेकिन फरवरी 1922 में किसानों के एक समूह ने गौरखपुर जिले के चौरी चौरा में एक पुलिस थाने में आग लगा दी. इस अग्निकांड में कई पुलिस वालों की जान चली गई. हिंसा भड़कने पर गांधी जी ने असहयोग आंदोलन तत्काल वापस लेना पड़ा. उन्होंने जोर दिया कि, ‘किसी भी तरह की उत्तेजना को निहत्थे और एक तरह से भीड़ की दया पर निर्भर व्यक्तियों की घृणित हत्या के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता है’.

इसीलिए 1920 का जिक्र कर भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान करते हुए गांधी जी ने साफ किया था कि वे हिंसा से उतनी ही नफरत करता हैं जितनी 1920 में किया करते थे. उन्‍होंने कहा कि मेरे वर्तमान प्रस्ताव और पहले के लेख और स्वभाव में कोई विरोधाभास नही है. मैं चाहता हूं कि आप सभी इस बात को जाने कि अहिंसा से ज्यादा शुद्ध और कुछ नहीं है, इस बात को मैं आज कह भी रहा हूं और अहिंसा के मार्ग पर चल भी रहा हूं. हमारी कार्यकारी समिति का बनाया हुआ प्रस्ताव भी अहिंसा पर ही आधारित है और हमारे आंदोलन के सभी तत्व भी अहिंसा पर ही आधारित होंगे. भगवान ने मुझे अहिंसा के रूप में एक मूल्यवान हथियार दिया है. मैं और मेरी अहिंसा ही आज हमारा रास्ता है. यदि आप में से किसी को भी अहिंसा पर भरोसा नहीं है तो कृपया करके इस प्रस्ताव के लिये वोट ना करें.

‘करो या मरो’ का नारा देते हुए गांधी जी ने कहा था कि अब मुझे डरने की बजाए आगे देखकर बढ़ना होगा. हमारी यात्रा ताकत पाने के लिए नहीं बल्कि भारत की आजादी के लिए अहिंसात्मक लड़ाई के लिए है. हिंसात्मक यात्रा में तानाशाही की संभावनाएं ज्यादा होती है जबकि अहिंसा में तानाशाही के लिए कोई जगह ही नही है. एक अहिंसात्मक सैनिक खुद के लिये कोई लोभ नही करता, वह केवल देश की आजादी के लिये ही लड़ता है. कांग्रेस इस बात को लेकर बेफिक्र है की आजादी के बाद कौन शासन करेगा. आजादी के बाद जो भी ताकत आएगी उसका संबंध भारत की जनता से होगा और भारत की जनता ही ये निश्चित करेंगी की उन्हें ये देश किसे सौपना है. हो सकता है कि भारत की जनता अपने देश को पेरिस के हाथों सौंपे. कांग्रेस सभी समुदायों को एक करना चाहती है ना कि उनमें फुट डालकर विभाजन करना चाहती है.

आजादी के बाद भारत की जनता अपनी इच्छानुसार किसी को भी अपने देश की कमान संभालने के लिये चुन सकती है और चुनने के बाद भारत की जनता को भी उसके अनुरूप ही चलना होंगा. मैं जानता हूं कि अहिंसा परिपूर्ण नहीं है और ये भी जानता हूं कि हम अपने अहिंसा के विचारों से फि‍लहाल कोसों दूर है लेकिन अहिंसा में ही अंतिम असफलता नहीं है. मुझे पूरा विश्वास है, छोटे-छोटे काम करने से ही बड़े-बड़े कामों को अंजाम दिया जा सकता है.

गांधी जी ने कार्यसमिति में कहा था कि मेरा इस बात पर भरोसा है कि दुनिया के इतिहास में हमसे बढ़कर और किसी देश ने लोकतांत्रिक आजादी पाने के लिये संघर्ष किया होगा. मेरा इस बात पर पूरा विश्वास है की जब हिंसा का उपयोग कर आजादी के लिये संघर्ष किया जाएगा तब लोग लोकतंत्र के महत्त्व को समझने में असफल होंगे. जिस लोकतंत्र का मैंने विचार कर रखा है, उस लोकतंत्र का निर्माण अहिंसा से होगा, जहां हर किसी के पास समान आजादी और अधिकार होंगे. जहां हर कोई खुद का शिक्षक होंगा और इसी लोकतंत्र के निर्माण के लिए आज मै आपको आमंत्रित करने आया हूं. एक बार यदि आपने इस बात को समझ लिया तब आप हिंदू और मुस्लिम के भेदभाव को भूल जाओगे. तब आप एक भारतीय बनकर खुद का विचार रखोगे और आजादी के संघर्ष में साथ दोगे.

गांधी जी यह विचार भी बेहद महत्‍वपूर्ण था कि कुछ लोग ब्रिटिश साम्राज्यवाद और ब्रिटिश लोगों के बीच के अंतर को भूल चुके है. उन लोगों के लिए दोनों ही एक समान है. उनकी यह घृणा जापानियों को आमंत्रित कर रही है. यह काफी खतरनाक होगा. इसका मतलब वे एक गुलामी की दूसरी गुलामी से अदला बदली करेंगे. हमें इस भावना को अपने दिलो दिमाग से निकाल देना चाहिए. हमारा झगडा ब्रिटिश लोगों के साथ नही हैं बल्कि हमें उनके साम्राज्यवाद से लड़ना है. ब्रिटिश शासन को खत्म करने का मेरा प्रस्ताव गुस्से से पूरा नही होने वाला. हम हमारे महापुरुषों के बलिदानों को नही भूल सकते हैं. मैं जानता हूं की ब्रिटिश सरकार हमसे हमारी आजादी छीन नहीं सकती लेकिन आजादी के लिए हमें एकजुट होना होगा. हमें खुद को घृणा से दूर रखना चाहिए.

इस तरह भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई. पूरे देश ने ही गांधी जी के आह्वान को स्‍वीकार किया और अंतत: ब्रिटिश सरकार को देश छोड़ना पड़ा। लेकिन जाते-जाते वे घृणा और विद्वेष का ऐसा बीज बो गए जिसने देश को विभाजन की कगार पर पहुंचा दिया.

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