Thursday, February 29, 2024
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हरिशंकर परसाई: रोना नहीं, लड़ना है, हाथ में जो हथियार है, उसी से लड़ना है

मैंने लेखन को दुनिया से लड़ने के लिए एक हथियार के रूप में अपनाया होगा. दूसरे, इसी में मैंने अपने व्यक्तित्व की रक्षा का रास्ता देखा. तीसरे, अपने को अवशिष्ट होने से बचाने के लिए मैंने लिखना शुरू कर दिया. यह तब की बात है, मेरा ख्याल है, तब ऐसी ही बात होगी. पर जल्दी ही मैं व्यक्तिगत दु:ख के इस सम्मोहन-जाल से निकल गया. मैंने अपने को विस्तार दे दिया. दु:खी और भी हैं. अन्याय पीड़ित और भी हैं. अनगिनत शोषित हैं. मैं उनमें से एक हूं. पर मेरे हाथ में कलम है और मैं चेतना सम्पन्न हूं. यहीं कहीं व्यंग्य – लेखक का जन्म हुआ. मैंने सोचा होगा- रोना नहीं है, लड़ना है. जो हथियार हाथ में है, उसी से लड़ना है. मैंने तब ढंग से इतिहास, समाज, राजनीति और संस्कृति का अध्ययन शुरू किया. साथ ही एक औघड़ व्यक्तित्व बनाया. और बहुत गंभीरता से व्यंग्य लिखना शुरू कर दिया. मुक्ति अकेले की नहीं होती. अलग से अपना भला नहीं हो सकता. मनुष्य की छटपटाहट मुक्ति के लिए, सुख के लिए, न्याय के लिए.

अपने व्‍यंग्‍यकार होने के कारण पर चर्चा करते हुए यह बात प्रख्‍यात व्‍यंग्‍यकार-कहानीकार हरिशंकर परसाई ने लिखी है. वे परसाई जिनका लेखन हिंदी में व्यंग्य का पर्याय है और व्यंग्य को विधा का दर्जा दिलवाने का श्रेय उन्‍हें ही दिया जाता है. हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त 1922 को मध्‍य प्रदेश के होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम) जिले में हुआ था. उनकी जीवन यात्रा संघर्षों से भरी रही. यही संघर्ष उनके लेखन का ईंधन भी साबित हुए. 18 वर्ष की उम्र में यानी 1940 में उन्‍होंने वन विभाग में नौकरी आरंभ की. 1957 तक के विभिन्‍न सरकारी और प्रायवेट नौकरियां करते रहे. लेखन भी जारी रहा. फिर 1957 में नौकरी छोड़कर पूर्ण रूप से लेखन कार्य करने लगे. जबलपुर से मासिक साहित्यिक पत्रिका ‘वसुधा’ का प्रकाशन किया. दैनिक अखबार नई दुनिया में ‘सुनो भइ साधो’ कॉलम लिखा. परसाई जी ने चाहे व्‍यंग्‍य लिखे या कहानियां, आत्‍मकथ्‍य या संस्‍मरण, उनकी शैली हमेशा ही व्‍यंग्‍यात्‍मक और सहज संप्रेषणीय रही है. ऐसा व्‍यंग्‍य जिस पर हंसा जा सकता है मगर तंज की मार से वह हंसी खिलती नहीं है, वह फीकी ही रहती है.

परसाई जी के व्‍यंग्‍य और कहानियों में हमेशा सामाजिक और राजनीतिक जीवन की रीतियों-नीतियों पर तीखा व्‍यंग्‍य मिलता है. लेकिन केवल लेखन ही नहीं बल्कि उनका पूरा जीवन और इस जीवन को कागजों पर उतार देना एक तरह से इन विसंगतियों के विरुद्ध बयान की तरह है. आज जब हम उन्‍हें पढ़ते हैं तो लगता है कैसे लिख पाए होंगे वे इतना खरा-खरा, जबकि सच बोलना तो तब भी उतना ही खतरनाक था. इतना ही जानलेवा कि लेखनी के कारण हुआ हमला ही अंतत: परसाई जी की बीमारी और मृत्‍यु का कारण बना. अपने लेखन और जीवन के उन तमाम प्रसंगों पर परसाई जी ने विस्‍तार से लिखा है जिन प्रसंगों ने उन्‍हें लेखक या कहिए व्‍यंग्‍यकार बनाया.

अपनी पुस्‍तक ‘हम इक उम्र से वाकिफ हैं’ परसाई जी लिखते हैं कि मैंने अपने दु:खों का ढिंढोरा नहीं पीटा. लेखन के आरंभ में कुछ उद्वेलित हुआ था और बाद में एक लेख ‘गर्दिश के दिन’ में लिखा था कि मैं नही चाहता अपने दु:खों को बहुत महत्त्व देना, उन्हें महिमा मंडित करना और बड़े लेखक होने के लिए जो ‘मार्कशीट’ तैयार होती है उसमें दु:ख के विषय में अधिक नंबर जुडवाना. अधिक दु:ख भोगने मात्र से कोई बड़ा लेखक नहीं होता. अधिक दु:ख भोगनेवाला चोर भी हो जाता है. किसी को बड़ा लेखक इसलिए नहीं माना जा सकता है कि उसने बहुत दु:ख भोगे हैं. सिर्फ हाय-हाय की कूची से कला में रंग नहीं भरे जाते.

दु:ख सबको होते हैं. यह पूरी तरह सही नहीं है कि दु:ख मनुष्य को ‘मांजता’ है, दु:ख आदमी को उठाता है. दु:ख किसी की संवेदना को व्यापक और गहरा बनाता है. उसे पर दु:ख कातर बनाता है. पर दु:ख मनुष्य को गिराता भी है. उसे नीच और क्षुद्र बनाता है.

1936 के प्‍लेग में पहले मां और फिर पिता को खोने के बाद छोटे भाई बहनों की जिम्‍मेदारी परसाई जी पर आ गई थी. आर्थिक संकटों के कारण उनके सितारे हमेशा गर्दिश में ही रहे. इस बारे में वे लिखते हैं, मैट्रिक हुआ, जंगल विभाग में नौकरी मिली. जंगल में सरकारी टपरे में रहता. ईंटे रखकर, उन पर पटिया जमाकर बिस्तर लगाता, नीचे जमीन चूहों ने पोली कर दी थी. रात भर नीचे चूहे धमाचौकड़ी करते रहते और मैं सोता रहता. कभी चूहे ऊपर आ जाते तो नींद टूट जाती पर मैं फिर सो जाता. छह महीने धमाचौकड़ी करते चूहों पर मैं सोया. बेचारा परसाई? नहीं, नहीं, मैं खूब मस्त था. दिन-भर काम. शाम को जंगल में घुमाई. फिर हाथ से बनाकर खाया गया भरपेट भोजन शुद्ध घी और दूध! पर चूहों ने बड़ा उपकार किया. ऐसी आदत डाली कि आगे की जिन्दगी में भी तरह-तरह के चूहों मेरे नीचे ऊधम करते रहे, सांप तक सर्राते रहे, मगर मैं पटिये बिछा कर पटिए पर सोता रहा हूं. चूहों ने ही नहीं मनुष्यनुमा बिच्छुओं और सापों ने भी मुझे बहुत काटा- पर जहरमोहरा मुझे शुरू में ही मिल गया. इसलिए बेचारा परसाई का मौका ही नहीं आने दिया. उसी उम्र से दिखाऊ सहानुभूति से मुझे बेहद नफरत है. अभी भी दिखाऊ सहानुभूति वाले को चांटा मार देने की इच्छा होती है. जब्त कर जाता हूं, वरना कई शुभचिन्तक पिट जाते.

अपने आत्‍मकथ्‍य में वे लिखते हैं, पहले दिन जब बाकायदा मास्साब बने तो बहुत अच्छा लगा. पहली तनख्वाह मिली ही थी कि पिताजी की मृत्यु की खबर आ गई. मां के बचे जेवर बेचकर पिता का श्राद्ध किया और अध्यापकी के भरोसे बड़ी जिम्मेदारियां लेकर जिंदगी के सफर पर निकल पड़े. गर्दिश के दिनों का विस्‍तार से उल्‍लेख करने के कारणों पर वे प्रकाश डालते हुए लिखते हैं कि गर्दिशें बाद में भी आईं, अब भी आती हैं, आगे भी आएंगी पर उस उम्र की गर्दिशों की अपनी अहमियत है. लेखक की मानसिकता और व्यक्तित्व निर्माण से इनका गहरा संबंध है. सामान्य स्वभाव का आदमी ठंडे-ठंडे जिम्मेदारियां भी निभा लेता, रोते-गाते दुनिया से तालमेल भी बिठा लेता और एक व्यक्तित्वहीन नौकरीपेशा आदमी की तरह जिंदगी साधारण संतोष से गुजार लेता.

परसाई जी लिखते हैं, मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ, जिम्मेदारियां, दु:खों की वैसी पृष्ठभूमि और अब चारों तरफ से दुनिया के हमले – इस सब सबके बीच सबसे बड़ा सवाल था अपने व्यक्तित्व और चेतना की रक्षा. तब सोचा नहीं था कि लेखक बनूंगा. पर मैं अपने विशिष्ट व्यक्तित्व की रक्षा तब भी करना चाहता था. जिम्मेदारी को गैर-जिम्मेदारी की तरह निभाओ. मैंने तय किया-परसाई, डरो मत किसी से. डरे कि मरे. सीने को ऊपर-ऊपर कड़ा कर लो. भीतर तुम जो भी हो. जिम्मेदारी को गैर-जिम्मेदारी की तरह निभाओ. जिम्मेदारी को अगर जिम्मेदारी के साथ निभाओगे तो नष्ट हो जाओगे. और अपने से बाहर निकलकर सब में मिल जाने से व्यक्तित्व और विशिष्टता की हानि नहीं होती. लाभ ही होता है. अपने से बाहर निकलो. देखो, समझो और हंसो.

वे बताते हैं कि, पहले अपने दु:खों के प्रति सम्मोहन था. अपने को दु:खी मानकर और मनवाकर आदमी राहत पा लेता है. बहुत लोग अपने लिए बेचारा सुनकर संतोष का अनुभव करते हैं. मुझे भी पहले ऐसा लगा. पर मैंने देखा, इतने ज्यादा बेचारों में मैं क्या बेचारा! इतने विकट संघर्षों में मेरा क्या संघर्ष!
मैं तभी समझ गया था कि आदमी को अपनी क्षमताओं को पहचानना चाहिए और उनका पूरा उपयोग करना चाहिए. इसके साथ ही धीरज रखना चाहिए. मुझमें अपार धीरज है. जो धीरज रख सके, वह जीतता है. उसकी बाकी मजबूरियां दब जाती हैं, उसे परास्त नहीं कर सकतीं. व्यक्तित्व को कोई भी सहारा देकर टूटने से बचाना चाहिए. अपने को साधारण आदमी मानना भी एक ताकत है. ऐसा आदमी असाधारणता के कोई फालतू सपने नहीं देखता और निराश नहीं होता, टूटता नहीं. मैंने हमेशा अपने को साधारण आदमी समझा. परसाई जी सच ही कहते हैं:

यह बड़ी अकेले नहीं लड़ी जा सकती है. अकेले वही सुखी हैं, जिन्हें कोई लड़ाई नहीं लड़नी. उनकी बात अलग है. अनगिनत लोगों को सुखी देखता हूं और अचरज करता हूं कि ये सुखी कैसे हैं! न उनके मन में सवाल उठते हैं न शंका उठती है. ये जब-तब सिर्फ शिकायत कर लेते हैं. शिकायत भी सुख देती है. और वे ज्यादा सुखी हो जाते हैं.

Tags: Art and Culture, Hindi Literature, Literature and Art

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