Thursday, May 23, 2024
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व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार करता है, आलोचना करता है, पाखंडों का पर्दाफाश करता है- हरिशंकर परसाई

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पगडंडियों का जमाना, जैसे उनके दिन फिरे, सदाचार की ताबीज, शिकायत मुझे भी है, ठिठुरता हुआ गणतंत्र, अपनी-अपनी बीमारी, वैष्णव की फिसलन, भूत के पाँव पीछे, बेईमानी की परत, सुनो भाई साधो, तुलसीदास चंदन घिसे, हँसते हैं रोते हैं, तब की बात और थी, ऐसा भी सोचा जाता है, पाखण्ड का अध्यात्म, आवारा भीड़ के खतरे और प्रेमचंद के फटे जूते उनके चर्चित व्यंग्य संग्रह हैं.

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