Thursday, February 29, 2024
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परसाई, तुम पर भीड़ हावी है, तुम हमेशा भीड़ की बात भीड़ के लिए लिखते हो

हरिशंकर परसाई की प्रमुख कृतिया हैं- ‘हँसते हैं रोते हैं’, ‘जैसे उनके दिन फिरे’ (कहानी-संग्रह); ‘रानी नागफनी की कहानी’, ‘तट की खोज’ (उपन्यास); ‘तब की बात और थी’, ‘भूत के पाँव पीछे’, ‘बेईमानी की परत’, ‘वैष्णव की फिसलन’, ‘पगडंडियों का ज़माना’, ‘शिकायत मुझे भी है’, ‘सदाचार का ताबीज’, ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’, ‘तुलसीदास चंदन घिसैं’, ‘हम इक उम्र से वाकिफ हैं’, ‘जाने -पहचाने लोग’, ‘कहत कबीर’, ‘ठिठुरता हुआ गणतंत्र’ (व्यंग्य निबंध-संग्रह); ‘पूछो परसाई से’ (साक्षात्कार).

‘परसाई रचनावली’ शीर्षक से छह खंडों में हरिशंकर परसाई की सभी रचनाएं संकलित हैं. परसाई जी की रचनाओं के अनुवाद लगभग सभी भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी में हुए हैं. परसाई को साहित्य अकादमी पुरस्कार, मध्य प्रदेश के शिखर सम्मान आदि अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया.

हरिशंकर परसाई के व्यंग्य संग्रह ‘पगडंडियों का ज़माना’ शीर्षक से राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है. ‘पगडंडियों का ज़माना’ आज के इस ज्वलन्त सत्य को उद्घाटित करता है कि सभी लोग किसी-न-किसी तरह ‘शॉर्टकट’ के चक्कर में हैं. इस तरह इस संग्रह का हर निबन्ध आज की वास्तविकता के किसी-न-किसी पक्ष पर चुटीला व्यंग्य करता है.

हरिशंकर परसाई के लेखन की यह विशेषता है कि वे केवल विनोद या परिहास के लिए नहीं लिखते. उनका सारा लेखन सोद्देश्य है और सभी रचनाओं के पीछे एक साफ-सुलझी हुई वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि है जो समाज में फैले हुए भ्रष्टाचार, ढोंग, अवसरवादिता, अन्धविश्वास, साम्प्रदायिकता आदि कुप्रवृत्तियों पर तेज रोशनी डालने के लिए हर समय सतर्क रहती है. कहने का ढंग चाहे जितना हल्का-फुल्का हो, किन्तु हर लेख आज की जटिल परिस्थितियों को समझने के लिए एक अन्तर्दृष्टि प्रदान करता है. प्रस्तुत है इस संग्रह का एक निबंध-

हम, वे और भीड़
जनवरी के नोट्स

एक कैलेंडर और बेकार हो गया. पन्ना-पन्ना मैला हो गया और हर तस्वीर का रंग उड़ गया. हर साल ऐसा होता है. जनवरी में दीवार पर चमकीली तस्वीरों का एक कैलेंडर टंग जाता है और दिसम्बर तक तस्वीर की चमक उड़ जाती है. हर तस्वीर बारह महीनों में बदरंग हो जाती है.

पुराने कैलेंडर की तस्वीर बच्चे काट लेते हैं और उसे कहीं चिपका देते हैं. हम सोचते हैं, बच्चों का मन बहलता है, पर यह उनके साथ कितना बड़ा धोखा है. साल-दर-साल हम उनसे कहते हैं, लो बेटो, जो साल हमने बिगाड़ दिया, उसे लो; उसकी तस्वीर से मन बहलाओ. बीते हुए की बदरंग मुरझाई तस्वीरें हैं ये. आगत की कोई चमकीली तस्वीर हम तुम्हें नहीं दे सकते. हम उसमें खुद धोखा खा चुके हैं और खाते रहे हैं. देनेवाले हमें भी तो हर साल के शुरू में रंगीन तस्वीर देते हैं कि लो अभागो, रोओ मत. आगामी साल की यह रंगीन तस्वीर है. मगर वह कच्चे रंग की होती है. साल बीतते वह भद्दी हो जाती है. धोखे की लम्बी परम्परा है. धोखा, जो हमें विरासत में मिला, हम तुम्हें देते हैं. किसी दिन तुम इन बदरंग तस्वीरों को हमारे सामने ही फाड़कर फेंक दोगे और हमारे मुंह पर थूकोंगे.

नया साल आ गया. पहले मैं 15 अगस्त से नया साल गिनता था. अब वैसा करते डर लगता है. मन में दर्द उठता है कि हाय, इतने साल हो गए फिर भी! जवाब मिलता है- कोई जादू थोड़े ही है. पर तरह-तरह के जादू तो हो रहे हैं. यही क्यों नहीं होता? अफसर के इतने बड़े मकान बन जाते हैं कि वह राष्ट्रपति को किराए पर देने का हौसला रखता है. किस जादू से गोदाम में रखे गेहूं का हर दाना सोने का हो गया? इसे बो दिया जाएगा, तो फिर सोने की फसल कट जाएगी.

जनवरी से साल बदलने में न दर्द उठता, न हाय होती और न ‘फिर भी’ का सवाल उठता. आखिरी हफ्ते में कुछ यादें जरूर होती हैं. 23 जनवरी याद दिलाती है कि सुभाष बाबू ने कहा था, ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा.’ खून तो हमने दे दिया, मगर आजादी किन्हें दे दी गई? फिर 24 या 25 तारीख को लालकिले पर सर्वभाषा कवि-सम्मेलन होता है जिसमें बड़े कवि मेहनत करके घटिया कविता लिखकर लाते हैं और छोटे कवि मेहनत से और घटिया अनुवाद करते हैं. हिंदी और उर्दू कवि खासतौर से उचक्कापन और ‘ओवरएक्टिंग’ करते हैं.

यों इन भाषाओं की सारी समकालीन कविता घटिया हीरो की ओवरएक्टिंग है. फिर 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस होता है और हम संविधान की प्रति निकालकर गणतंत्र के निर्देशक सिद्धान्त और बुनियादी अधिकारों का पाठ करते हैं. इसी वक्त गुरु गोलवलकर की वाणी सुनाई देती है कि राष्ट्र तो यह सिर्फ हिन्दुओं का है- मुसलमान, पारसी, ईसाई वगैरह विदेशी हैं और खासकर मुसलमान तो देशद्रोही हैं. मगर जो सुरक्षा सम्बन्धी गुप्त बातें पाकिस्तान को बताते हुए पकड़े गए, वे शुद्ध ब्राह्मण हैं. यह भी जादू है.
फिर 30 जनवरी…

हमारे बापों से तब कहा जाता था कि आजादी की घास गुलामी के घी से अच्छी होती है. हम तब बच्चे थे, मगर हमने भी इसे सुना, समझा और स्वीकारा.
आजाद हो गए, तो हमने कहा- अच्छा, अब हम गौरव के साथ घास भी खा लेंगे.
नारा लगानेवालों से पूछना भूल गए कि कब तक खाएंगे.
मगर हमने देखा कि कुछ लोगों ने अपनी काली-काली भैंसें आजादी की घास पर छोड़ दीं और घास उनके पेट में जाने लगी. तब भैंसवालों ने उन्हें दुह लिया और दूध का घी बनाकर हमारे सामने ही पीने लगे.
मेरा एक मित्र सही कहता है- परसाई, तुम पर भीड़ हावी है. तुम हमेशा भीड़ की बात भीड़ के लिए लिखते हो. देखते नहीं, अच्छे लेखकों की सबसे बड़ी चिन्ता यह है कि भीड़ के दबाव से कैसे बचा जाए.
धोखा ही हुआ न! हमें और हमारे बापों को बताया ही नहीं गया था कि आजादी की घास तो होगी, पर कुछ के पास कभी-कभी भैंसें भी होंगी.
अब हम उनसे कहते हैं- यारो, तुम भी आजादी की घास खाओ न!
वे जवाब देते हैं- खा तो रहे हैं. तुम घास सीधे खा लेते हो और हम भैंसों के मारफत खाते हैं. वह अगर घी बन जाती है, तो हम क्या करें?
और हम अपने बाप को कोसते हैं कि तुमने तभी इस बारे में साफ बातें क्यों नहीं कर लीं. वह काली भैंसोंवाली शर्त क्यों मान ली? क्या हक था तुम्हें हमारी तरफ से घाटे का सौदा करने का?
सोशलिस्ट अर्थशास्त्री से पूछते हैं तो वह अपनी उलझी दाढ़ी पर हाथ फेरकर कहता है- कम्पल्शंस ऑफ ए बैकवर्ड इकानमी! पिछड़ी आर्थिकता की बाध्यताएं हैं ये.
हैं तो. घर से दुकान तक पहुंचते भाव बढ़ जाते हैं.
देश एक कतार में बदल गया है. चलती-फिरती कतार है- कभी चावल की दुकान पर खड़ी होती है, फिर सरककर शक्कर की दुकान पर चली जाती है. आधी जिन्दगी कतार में खड़े-खड़े बीत रही है.
‘शस्य श्यामला’ भूमि के वासी ‘भारत भाग्य विधाता’ से प्रार्थना करते हैं कि इस साल अमेरिका में गेहूं खूब पैदा हो और जापान में चावल.
हम ‘मदरलैंड’ न कहकर ‘फादरलैंड’ कहने लगें तो ठीक रहेगा. रोटी मां से मांगी जाती है, बाप से नहीं. ‘फादरलैंड’ कहने लगेंगे, तो ये मांगें और शिकायतें नहीं होंगी.
मैं फिर ‘भीड़’ के चक्कर में पड़ गया.
मेरा एक मित्र सही कहता है- परसाई, तुम पर भीड़ हावी है. तुम हमेशा भीड़ की बात भीड़ के लिए लिखते हो. देखते नहीं, अच्छे लेखकों की सबसे बड़ी चिन्ता यह है कि भीड़ के दबाव से कैसे बचा जाए.

छोटा आदमी हमेशा भीड़ से कतराता है. एक तो उसे अपने वैशिष्ट्य के लोप हो जाने का डर रहता है, दूसरे कुचल जाने का. जो छोटा है, और अपनी विशिष्टता को हमेशा उजागर रखना चाहता है, उसे सचमुच भीड़ में नहीं घुसना चाहिए. लघुता को बहुत लोग इस गौरव से धारण करते हैं, जैसे छोटे होने के लिए उन्हें बड़ी तपस्या करनी पड़ी है. उन्हें भीड़ में खो जाने का डर बना रहता है.

एक तरकीब है, जिससे छोटा आदमी भी भीड़ में विशिष्ट और सबके ध्यान का केन्द्र बन सकता है- उसे बकरे की या कुत्ते की बोली बोलने लगना चाहिए. भीड़ का उद्देश्य जब सस्ता अनाज लेने का हो, वह इसके लिए आगे बढ़ रही हो, उसका ध्येय, एक मन:स्थिति और एक गति हो- तब यदि छोटा आदमी बकरे की बोली बोल उठे, तो वह एकदम विशिष्ट हो जाएगा और सबका ध्यान खींच लेगा.
लोग मुझसे कहीं होशियार हैं. मेरे बताए बिना भी वे यह तरकीब जानते हैं और भूखों की भीड़ में बकरे की बोली बोल रहे हैं.
बड़ा डर है कि भीड़ हमें याने स्वतंत्र चिन्तकों और लेखकों को दबोच रही है.

वे नहीं जानते या छिपाते हैं कि भीड़ से अलग करके भी किसी एकान्त में दबोचे जाते हैं. लेखकों की चोरी करनेवाले कई गिरोह हैं. वे भीड़ में शिकार को ताड़ते रहते हैं और किसी बहाने उसे भीड़ से अलग करके, अपने साथ किसी अंधेरी कोठरी में ले जाते हैं. वहां उसके हाथ-पांव बांधकर मुंह में कपड़ा ठूंस देते हैं. तब स्वतंत्र चिन्तक सिर्फ ‘घों-घों’ की आवाज निकाल सकता है. गिरोहवाले उस ‘घों-घों’ में सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्य ढूंढ़कर बता देते हैं. उसे तत्त्व-ज्ञान सिद्ध कर देते हैं.
जिसकी अनाज की थैली लेकर कोई दूसरा कतार में खड़ा है, वह भीड़ से घृणा कर सकता है. जिसका थैला अपने ही हाथ में है, वह क्या करे?
भीड़ से बचने का एक तरीका और है. एक मीनार खड़ी करो. उस पर बैठ जाओ. एक लम्बी रस्सी में खाने का डिब्बा बांधकर नीचे लटकाओ और ऊपर से रोओ. कोई दया करके डिब्बे में रोटी-दाल रख देगा. डिब्बा ऊपर खींचकर रोटी खा लो और ऊपर से भीड़ पर थूको.
लेखक की हालत खस्ता है. वह सोचता है कि मेरा अलग से कुछ हो जाए. सबके साथ होने में विशिष्टता मारी जाती है. दिन-भर पेट भरने के लिए उसके जूते घिसते हैं और शाम को वह कॉफी-हाउस में बैठकर कहता है कि कोई हमें भीड़ से बचाओ.
उधर भीड़ कहती है कि कोई हमें इनसे बचाओ.

राजनीति की बू आती है, इन बातों से. है न?
लेखक को तो मनुष्य से मतलब है, राजनीति वगैरह से क्या?
मगर मनुष्य की नियति तय करनेवाली एक राजनीति भी है.
लेखक दम्भ से कहता है, पहली बार हमने जीवन को उसके पूर्ण और यथार्थ रूप में स्वीकारा है.
तूने भाई, किसका जीवन स्वीकारा है? जीवन तो अर्थमंत्री के बदलने से भी प्रभावित हो रहा है और अमेरिकी चुनाव से भी.
कल अगर फासिस्ट तानाशाही आ गई, तो हे स्वतंत्र चिन्तक, हे भीड़-द्वेषी, तेरे स्वतंत्र चिन्तन और लेखन का क्या होगा? फिर तो तेरा गला दबाया जाएगा और तूने अपनी इच्छा से कोई आवाज निकालने की कोशिश की तो गला ही कट जाएगा.
आज तू यह सोचने में झेंपता है और ऊपर से कहता है—आज हम जीवन से सम्पृक्त हैं.

भीड़ की बात छोड़ें. लेखकों की बातें करें.
‘अज्ञेय’ को ‘आँगन के पार द्वार’ पर अकादमी पुरस्कार मिल गया. पहले क्यों नहीं मिला? उम्र कम थी.
आम मत है कि ‘आँगन के पार द्वार’ से पहले के संग्रहों की कविताएं अच्छी हैं.
फिर उन पर क्यों पुरस्कार नहीं मिला? तब उम्र कम थी और अच्छी रचना को पुरस्कृत करने की कोई परम्परा नहीं है.
पं. माखनलाल चतुर्वेदी का सम्मान हुआ और थैली भेंट की गई.
पहले क्यों नहीं यह हुआ? उम्र उनकी भी कम थी.
जानसन ने लॉर्ड चेस्टरफील्ड को चिट्ठी में लिखा था कि माई लॉर्ड, क्या ‘पेट्रन’ वह होता है जो किनारे पर खड़ा-खड़ा आदमी को पानी में डूबते देखता रहे और जब वह किसी तरह बचकर बाहर निकल आए, तो उसे गले लगा ले.
पुरस्कार और आर्थिक सहायता रचना करने के लिए मिलते हैं या रचना बन्द करने के लिए?
मैं देनेवालों के पास जाऊं और कहूं- सर, मैं लिखना बन्द कर रहा हूं, इस उपलक्ष्य में मुझे आप क्या देते हैं?
सर पूछेगा- कब से बन्द कर रहे हो?
– अगली पहली तारीख से।
सर कहेगा—तुम कल ही से बन्द कर दो तो मैं कल ही से तुम्हारी मासिक सहायता बांध देता हूं. खबरदार, लिखा तो बन्द कर दूंगा.
मैं कहूंगा- ऐसा है तो आज से ही बन्द कर दूंगा. आज से ही तनखा बांध दीजिए.
एक वृद्ध गरीब लेखक बेचारा इधर शहर में घूम रहा है. उसे दो ‘प्रतिष्ठित’ आदमियों से दरिद्रता के सर्टिफिकेट चाहिए. उसने सहायता के लिए दरख्वास्त दी है. उसमें नत्थी करेगा. तब कलेक्टर के चक्कर लगाएगा और कलेक्टर जांच करके सिफारिश करेगा कि हां, यह लेखक सचमुच दरिद्र है, दीन है. जो दीन नहीं है, ऐसे दो बेईमान चन्दा खानेवालों ने इसकी दरिद्रता प्रमाणित की है.
क्या मतलब है इन शब्दों का- स्वतंत्रचेता, द्रष्टा, विशिष्ट, आत्मा के प्रति प्रतिबद्ध, आत्मा का अन्वेषी?

जिसने हमें क्रान्ति सिखाई थी और जो कहता है कि मेरी आत्मा में हिमालय घुस गया है, उसे मैंने अभी देखा.
जिसने ज्वाला धधकाने की बात की थी, उसे भी अभी देखा.
जो सन्त कवियों की ‘स्पिरिट’ को आत्मसात् किए है, उसे भी देखा.
कहां देखा?
मुख्यमंत्री के आसपास. तीनों में स्पर्धा चल रही थी कि कौन किस जेब में घुस जाए. कोट की दो जेबों में दो घुस गए.
तीसरे ने कहा- हाय, अगर मुख्यमंत्री पतलून पहने होते, तो मैं उसकी जेब में घुस जाता.
तीनों ‘एम्प्लायमेंट एक्सचेंज’ से कार्ड बनवाकर जेब में रखे हैं. किसी को कुछ होना है, किसी को कुछ!
कहानी पर बात करना व्यर्थ है. मैं पिछले दो महीने से व्यूह-रचना के सम्पर्क में नहीं हूं. उसे जाने बिना मूल्यों की बात नहीं हो सकती. दिल्ली आकर चार तरह के लेखकों से मिलूंगा. वे चार तरह के कौन? कॉफी-हाउसवाले, टी-हाउसवाले, शालीमारवाले और फोन पर हेलोवाले!
साहित्य को सबसे बड़ी समस्या इस समय यह है कि डॉ. नामवर सिंह ने एक लेख में श्रीकान्त वर्मा को ‘कोट’ किया है और तारीफ तथा सहमति के साथ किया है. यह चकित कर देनेवाली बात है.
हम सबके लिए आगामी माह का साहित्यिक ‘असाइनमेंट’ यही है कि हम इस रहस्य का पता लगाएं. तब कुछ लिखें-पढ़ें.

पुस्तकः पगडंडियों का जमाना
लेखकः हरिशंकर परसाई
प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन

Tags: Books, Hindi Literature, Hindi Writer, Literature

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