Thursday, June 13, 2024
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मुस्लिमों के खिलाफ मॉब लिंचिंग को लेकर PIL, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और 6 राज्‍यों को भेजा नोटिस

नई दिल्ली. उच्चतम न्यायालय शुक्रवार को एक महिला संगठन द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया जिसमें अनुरोध किया गया है कि गोरक्षकों द्वारा मुसलमानों के खिलाफ भीड़ हिंसा (मॉब लिंचिंग) और भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या किए जाने की घटनाओं से प्रभावी रूप से निपटने के लिए शीर्ष अदालत के वर्ष 2018 के फैसले के अनुरूप राज्यों को तत्काल कार्रवाई करने का निर्देश दिया जाए.

न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ ने केंद्र और महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश तथा हरियाणा के पुलिस महानिदेशकों को नोटिस जारी कर याचिका पर उनका जवाब मांगा. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े संगठन नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वुमेन (एनएफआईडब्ल्यू) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने मामले को फैसले के लिए उच्च न्यायालयों में भेजने के खिलाफ अनुरोध किया.

कपिल सिब्बल ने कहा कि पिछली बार जब वह शीर्ष अदालत में पहुंचे तब उन्हें उच्च न्यायालयों में जाने के लिए कहा गया था. सिब्बल ने कहा, ‘अगर ऐसा हुआ तो मुझे विभिन्न उच्च न्यायालयों में जाना पड़ेगा. लेकिन पीड़ितों को क्या मिलेगा? दस साल बाद दो लाख का मुआवजा. भीड़ हिंसा के संबंध में तहसीन पूनावाला मामले में वर्ष 2018 के फैसले के बावजूद यह स्थिति है. मेरे पास क्या उपाय है, मैं कहां जाऊंगा.’ इसके बाद पीठ ने सिब्बल से कहा कि वह याचिका पर संबंधित पक्षकारों को नोटिस जारी कर रही है.

अधिवक्ता सुमिता हजारिका के माध्यम से दायर याचिका में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित निर्देशों के अनुसार लिंचिंग और भीड़ हिंसा के मामलों में तत्काल कार्रवाई करने के लिए संबंधित राज्यों के पुलिस महानिदेशकों को निर्देश देने की मांग की गई है. इसमें अन्य बातों के अलावा हाल की एक घटना का जिक्र किया गया है, जिसमें 28 जून को बिहार के सारण जिले में गोमांस ले जाने के संदेह में जहरुद्दीन नाम के 55 वर्षीय ट्रक ड्राइवर को कथित तौर पर भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला था.

याचिका में अनुरोध किया गया है कि अदालत द्वारा न्यूनतम एक समान मुआवजा निर्धारित किया जाए जो अधिकारियों द्वारा निर्धारित राशि के अतिरिक्त पीड़ितों या उनके परिवारों को दिया जाना चाहिए. इसमें आरोप लगाया गया, ‘ज्यादातर मामलों में केवल एफआईआर दर्ज करने की न्यूनतम कार्रवाई ही अधिकारियों द्वारा की जाती है, जो किसी भी वास्तविक कार्रवाई की शुरुआत की तुलना में एक औपचारिकता अधिक लगती है.’

याचिका में कहा गया है कि लिंचिंग और भीड़ हिंसा को झूठे प्रचार के माध्यम से अल्पसंख्यक समुदायों के बहिष्कार की सामान्य कहानी के परिणाम के रूप में देखा जाना चाहिए, जो सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाषणों के साथ-साथ मीडिया चैनल, समाचार चैनल और फ़िल्मों के माध्यम से फैलाया जा रहा है. याचिका में कहा गया है कि राज्य का ‘अत्यंत ईमानदारी और सच्ची प्रतिबद्धता के साथ अपने नागरिकों को अनियंत्रित तत्वों और सुनियोजित लिंचिंग और सतर्कता के अपराधियों से बचाने का पवित्र कर्तव्य है’.

Tags: Kapil sibal, Maharashtra, Mob lynching, Odisha, Supreme Court

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