Sunday, July 14, 2024
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कभी अदृश्य व्यापारी कहे जाते थे ये आदिवासी, अब बचे हैं सिर्फ 1075, अस्तित्व पर क्यों मंडरा रहा संकट?

पिथौरागढ़. उत्तराखंड के पिथौरागढ़, चंपावत और ऊधमसिंह नगर के कुछ इलाकों में आदिम राजी जनजाति सदियों से रहती है. लेकिन इस जनजाति पर अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है. राज्य में अब राजी जनजाति के अब सिर्फ 249 परिवार ही बचे हैं. तीनों जिलों में इस जनजाति के सिर्फ 1075 लोग ही जीवित हैं. भयंकर गरीबी और पिछड़ेपन के कारण इस जनजाति के ज्यादातर लोग समय से पहले ही दुनिया को अलविदा कहने को मजबूर हैं. राजी जनजाति की औसत आयु 55 साल से भी कम आंकी गई है. यही वजह है कि उत्तराखंड हाईकोर्ट को भी इस मामले का संज्ञान लेना पड़ा.

सुविधाओं की कमी और कठिन जीवन शैली इस जनजाति की सबसे बड़ी समस्या है. कमला देवी का कहना है कि उनके पास न तो रहने के लिए घर है, ना ही रोजगार का कोई साधन. पीने के पानी के लिए वे बरसात पर निर्भर हैं. उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं का दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है. इन्हीं सब कारणों से उनके समुदाय के लोग कम हो रहे हैं. राजी जनजाति के लिए काम कर रही अर्पण संस्था में कार्यरत खीमा जेठी का कहना है कि राजी जनजाति के वर्तमान हालात के लिए सिर्फ आर्थिक कारण जिम्मेदार हैं. हालात सुधारने पर ध्यान दिया गया तो इनकी जनसंख्या निश्चत रूप से बढ़ेगी.

पहला पीएचसी 38 किमी, आंगनबाड़ी 5 किमी दूर
एक समय में राजी जनजाति को अदृश्य व्यापारी भी कहा जाता था. लकड़ी का काम करने वाली ये जाति रात के अंधेरे में लोगों के घरों में लकड़ी के बर्तन ऱखती थी, जिसके बदले इन्हें राशन मिला करता था. लेकिन बदलते दौर के साथ इनकी जीवन शैली भी बदली. नतीजा ये है कि इस जाति के पुरुष नशे के शिकार हो रहे हैं. जबकि महिलाएं इलाज के अभाव में दम तोड़ रही हैं. जिन इलाकों में राजी जनजाति रहती है, वहां से पीएचसी की दूरी 38 किलोमीटर, आंगनबाड़ी केन्द्र की दूरी 6 किलोमीटर और प्राइमरी स्कूल की दूरी 5 किलोमीटर है.

जनजाति से दो बार विधायक
सिर्फ 1075 की संख्या वाली राजी जनजाति से उत्तराखंड की पहली और दूसरी विधानसभा में धारचूला सीट से एमएलए भी मिला है. 2002 और 2007 के विधानसभा चुनावों में इस जाति के गगन रजवार ने कांग्रेस और बीजेपी जैसी पार्टियों की जमानत जब्त करा दी थी. बावजूद इसके राजी जनजाति की जिंदगी में रत्ती भर भी बदलाव नहीं आया.

सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने की कोशिश: डीएम
पिथौरागढ़ की डीएम  रीना जोशी का कहना है कि उनकी पूरी कोशिश ये हैं कि सभी राजी जनजाति के लोगों के प्रमाण पत्र बनें ताकि उन्हें सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ मिल सके. राजी जनजाति को दुनिया की सबसे दुर्लभ जनजातियों में भले ही शुमार किया गया हो लेकिन इसे बचाने की असल कोशिश होती कहीं दिखाई नहीं दे रही. कुछ संगठन इस जनजाति को बचाने की पहल करते दिखाई देते हैं लेकिन जरूरी साधनों की कमी के चलते ये पहल परवान नही चढ़ पा रही. ऐसे में अगर इन्हें यूं ही इनके हाल में छोड़ा गया तो तय है कि ये आदिम जाति इतिहास के पन्नों में सिमट जाएगी.

Tags: Tribes of India, Uttarakhand news

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