Thursday, May 23, 2024
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बेलाग-बेपरवाह कवि-लेखक-पत्रकार विष्णु खरे की लोकप्रिय कविता ‘लड़कियों के बाप’

बेलाग-बेपरवाह कवि, लेखक और पत्रकार विष्णु खरे का दिल कभी मुंबई में लगा नहीं. वह अपने परिवार के साथ मायानगरी में चले तो गए थे, लेकिन दिल्ली वापिस आने का मौका तलाशते रहते थे. यह संयोग ही है कि जब उन्हें स्ट्रोक आया, तब वह दिल्ली में अकेले थे और 19 सितंबर 2018 को ब्रेन हैमरेज की वजह से उनकी मृत्यु हो गई. उनकी तरह हिंदी साहित्य की दुनिया में ऐसे बहुत कम लोग हुए, जिन्हें चेक, जर्मन, अंग्रेजी, ऊर्दू, हिंदी, मराठी और बांग्ला जैसी कई भाषाओं का भी ज्ञान हो. संगीत में उनकी गहरी दिलचस्पी थी. स्वभाव से वह बेहद अंतर्मुखी थे, लेकिन अपनी रचनाओं में उतने ही सहज, सरल और खुले हुए.

गौरतलब है कि विष्णु खरे को ‘फ़िनलैंड का राष्ट्रीय ‘नाइट ऑफ द व्हाइट रोज़’ सम्मान’, ‘शिखर सम्मान’, ‘रघुवीर सहाय सम्मान’ और ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ जैसे पुरस्कारों से प्रतिष्ठित मंचों पर समादृत किया गया. ‘मरुप्रदेश और अन्य कविताएं’, ‘विष्णु खरे की कविताएं’, ‘ख़ुद अपनी आंख से’, ‘सबकी आवाज़ के पर्दे में’, ‘पिछला बाक़ी’, ‘काल और अवधि के दरमियान’ आदि विष्णु खरे की प्रकाशित प्रमुख कृतियां हैं. साथ ही उन्होंने ‘दि पीपुल एंड दि सैल्फ’, ‘डेअर ओक्सेनकरेन’, ‘यह चाकू समय’, ‘हम सपने देखते हैं’, ‘काले वाला’, डच उपन्यास ‘अगली कहानी’ (सेस नोटेबोम), ‘हमला’, ‘दो नोबल पुरस्कार विजेता कवि’ जैसी कई पुस्तकों का हिंदी से अंग्रेजी में और अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद भी किया.

विष्णु खरे की कविताओं की सबसे खास बात यह है कि उन्होंने अकाव्यात्मक शिल्प में अख़बारी ख़बर की तरह कविताएं लिखीं. तनी हुई तटस्थता, निर्लिप्तता और निर्ममता उनका काव्य विधान बनाती है. जैसे वे कविता नहीं लिख रहे हों, बल्कि तथ्य रख रहे हों और अचानक इन तथ्यों के बीच छुपी काव्यात्मकता को उजागर कर देते हों. हिंदी लेखन और साहित्य की परंपरा पर विष्णु खरे की पकड़ बहुत मजबूत थी. अपनी कटुता को प्रखर हास्यबोध के साथ जोड़ते हुए सामने वाले पर कशाघात करने से वह कभी पीछे नहीं हटे. इस लिहाज से वे हिंदी के दुर्वासा जैसे थे, लेकिन उनका असल मोल उनकी कविताओं में निहित था.

बिना किसी फायदे के सच कहने की अपनी ज़िद के चलते आलोचना करते-करते विष्णु खरे बहुत दूर तक निकल गए. वह नवोदित रचनाकारों पर अपनी ख़ास नजर रखते थे और उन पर अच्छी-बुरी हर तरह की टिप्पणी खुल कर करते थे. पत्र-पत्रिकाओं या ब्लॉग्स पर कविताएं पढ़कर पसंद आने के बाद बिना हिचक फोन अथवा मेल करते और बदले में कोई उम्मीद भी नहीं करते थे. जिसकी वजह से उन्हें व्यक्तिगत तौर पर कई निराशाएं भी हाथ लगीं.

विष्णु खरे ने बिल्कुल नामुमकिन विषयों पर अनेक कविताएं लिखीं, जिसके चलते हिंदी की समृद्ध काव्य परंपरा में उनका योगदान अविस्मरणीय है. उनकी कुछ कविताएं प्रकाशित होते ही क्लासिक की श्रेणी में पहुंच गईं. उनकी कविता ‘लालटेन जलाना’, ‘सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा’ और ‘लड़कियों के बाप’ को उच्च श्रेणी में रखा जाता है. ‘लड़कियों के बाप’ कविता को उनके काव्य-संग्रह ‘सब की आवाज़ के पर्दे में’ में सम्मिलित किया गया. इस संग्रह को ‘राधाकृष्ण प्रकाशन’ ने साल 1994 में प्रकाशित किया था. आइए पढ़ते हैं उनकी यह बहुख्यात रचना-

लड़कियों के बाप : विष्णु खरे
वे अक्सर वक्त के कुछ बाद पहुंचते हैं
हड़बड़ाए हुए बदहवास पसीने-पसीने
साइकिल या रिक्शों से
अपनी बेटियों और उनके टाइपराइटरों के साथ
करीब-करीब गिरते हुए उतरते हुए
जो साइकिल से आते हैं वे गेट से बहुत पहले ही पैदल आते हैं

उनकी उम्र पचपन से साठ के बीच
उनकी लड़कियों की उम्र अठारह से पच्चीस के बीच
और टाइपराइटरों की उम्र उनके लिए दिए गए किराए के अनुपात में

क्लर्क टाइपिस्ट की जगह के लिए टैस्ट और इन्टरव्यू हैं
सादा घरेलू और बेकार लड़कियों के बाप
अपनी बच्चियों और टाइपराइटरों के साथ पहुंच रहे हैं

लड़कियां जो हर इम्तहान में किसी तरह पास हो पाई हैं
दुबली-पतली बड़ी मुश्किल से कोई जवाब दे पाने वालीं
अंग्रेजी को अपने-अपने ढंग से ग़लत बोलनेवालीं
किसी के भी चेहरे पर सुख नहीं
हर एक के सीने सपाट
कपड़ों पर दाम और फ़ैशन की चमक नहीं
धूल से सने हुए दुबले चिड़ियों जैसे सांवले पंजों पर पुरानी चप्पलें

इम्तहान की जगह तक बड़े टाइपराइटर मैली चादरों में बंधे
उठाकर ले जाते हैं बाप
लड़कियां अगर दबे स्वर में मदद करने को कहती भी हैं
तो आज के विशेष दिन और मौके पर उपयुक्त प्रेमभरी झिड़की से मना कर देते हैं
ग्यारह किलो वज़न दूसरी मंज़िल तक पहुंचाते हुए हांफते हुए
इम्तहान के हाल में वे ज़्यादा रुकना चाहते हैं
घबराना नहीं वगैरह कहते हुए लेकिन किसी भी जानकारी के लिए चौकन्ने
जब तक कि कोई चपरासी या बाबू
तंग आकर उन्हे झिड़के और बाहर कर दे
तिस पर भी वे उसे बार-बार हाथ जोड़ते हुए बाहर आते हैं

पता लगाने की कोशिश करते हुए कि डिक्टेशन कौन देगा
कौन जांचेगा पर्चों को
फिर कौन बैठेगा इन्टरव्यू में
बड़े बाबुओं और अफ़सरों के पूरे नाम और पते पूछते हुए
कौन जानता है कोई बिरादरी का निकल आए
या दूर की ही जान-पहचान का
या अपने शहर या मुहल्ले का
उन्हें मालूम है ये चीज़ें कैसे होती हैं
मुमकिन है कि वे चाय पीने जाते हुए मुलाज़िमों के साथ हो लें
पैसे चुकाने का मौका ढूंढते हुए
अपनी बच्ची के लिए चाय और कोई खाने की चीज़ की तलाश के बहाने
उनके आधे अश्लील इशारों सुझावों और मज़ाकों को
सुना-अनसुना करते हुए नासमझ दोस्ताने में हंसते हुए
इस दफ़्तर में लगे हुए या मुल्क के बाहर बसे हुए
अपने बड़े रिश्तेदारों का ज़िक्र करते हुए

वे हर अंदर आने वाली लड़की से वादा लेंगे
कि वह लौटकर अपनी सब बहनों को बताएगी कि क्या पूछते हैं
और उसके बाहर आने पर उसे घेर लेंगे
और उसकी उदासी से थोड़े ख़ुश और थोड़े दुखी होकर उसे ढाढस बंधाएंगे
अपनी-अपनी चुप और पसीने पसीने निकलती लड़की को
उसकी अस्थाई सहेलियों और उनके पिताओं के सवालों के बाद
कुछ दूर ले जाकर तसल्ली देंगे
तू फिकर मत कर बेटा बहुत मेहनत की है तूने इस बार
भगवान करेगा तो तेरा ही हो जाएगा वगैरह कहते हुए
और लड़कियां सिर नीचा किए हुए उनसे कहती हुईं पापा अब चलो

लेकिन आख़िरी लड़की के निकल जाने तक
और उसके बाद भी
जब इन्टरव्यू लेने वाले अफसर अंग्रेजी में मज़ाक़ करते हुए
बाथरूम से लौटकर अपने अपने कमरों में जा चुके होते हैं
तब तक वे खड़े रहते हैं
जैसा भी होगा रिज़ल्ट बाद में घर भिजवा दिया जाएगा
बता दिए जाने के बावजूद
किसी ऐसे आदमी की उम्मीद करते हुए जो सिर्फ़ एक इशारा ही दे दे
आफ़िस फिर आफ़िस की तरह काम करने लगता है
फिर भी यक़ीन न करते हुए मुड़ मुड़कर पीछे देखते हुए वे उतरते हैं भारी टाइपराइटर और मन के साथ जो आए थे रिक्शों पर वे जाते हैं दूर तक
फिर से रिक्शे की तलाश में
बीच बीच में चादर में बंधे टाइपराइटर को फ़ुटपाथ पर रखकर सुस्ताते हुए
ड्योढ़ा किराया मांगते हुए रिक्शेवाले और ज़माने के अंधेर पर बड़बड़ाते हुए
फिर अपनी लड़की का मुंह देखकर चुप होते हुए
जिनकी साइकिलें दफ्तर के स्टैंड पर हैं
वे बांधते हैं टाइपराइटर कैरियर पर
स्टैंडवाला देर तक देखता रहता है नीची निगाह वाली लड़की को
जो पिता के साथ ठंडे पानी की मशीनवाले से पांच पैसा गिलास पानी पीती है
और इमारत के अहाते से बाहर बैठती है साइकल पर सामने
दूर से वह अपने बाप की गोद में बैठी जाती हुई लगती है

Tags: Book, Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer

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