Thursday, February 22, 2024
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गुरु दत्त की ज़िंदगी को बहुत करीब से देखना है, तो ज़रूर पढ़ें यासिर उस्मान की किताब ‘गुरु दत्त : एक अधूरी दास्तान’

मुरादाबाद में जन्मे यासिर उस्मान टेलीविजन पत्रकार, एंकर और जीवनी-लेखक (बायोग्राफी राइटर) हैं और लंदन में रहते हैं. पत्रकारिता में उत्कृष्टता के लिए इन्हें ‘रामनाथ गोयनका’ जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है. यासिर भारत के सबसे सफल फिल्म बायोग्राफी राइटर्स में से एक हैं और सफल के साथ-साथ पसंदीदा भी. वैसे तो यासिर अंग्रेजी के लेखक हैं, लेकिन इनकी रिसर्च और किताबें इतनी बेहतरीन होती हैं, कि उनका हिंदी संस्करण भी अनुवादित होकर साथ ही प्रकाशित होता है. यासिर ने साल 2014 में ‘राजेश खन्ना : द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ इंडियाज़ फर्स्ट सुपरस्टार’, साल 2016 में ‘रेखा : द अनटोल्ड स्टोरी’ और साल 2018 में ‘संजय दत्त : द क्रेज़ी अनटोल्ड स्टोरी ऑफ बॉलीवुड्स बैड बॉय’ जैसी बेस्टसेलिंग किताबें लिखी हैं. साल 2021 में आई ‘गुरु दत्त : एन अनफिनिश्ड स्टोरी’ यासिर की चौथी पुस्तक है, जिसे हिंदी में ‘गुरु दत्त : एक अधूरी दास्तान’ नाम से प्रकाशित किया गया है. ‘गुरु दत्त : एन अनफिनिश्ड स्टोरी’ को महेंद्र नारायण सिंह यादव ने हिंदी में अनुवादित किया है, जिसका प्रकाशन ‘मंजुल प्रकाशन’ ने किया है. इन सभी बेस्टसेलिंग किताबों के बाद यासिर उस्मान एक बेस्टसेलर राइटर के रूप में स्थापित हो चुके हैं.

एक बायोग्राफी राइटर के तौर पर यासिर की किताबें इसलिए भी ख़ास हो जाती हैं, क्योंकि अपनी हर किताब पर उनकी रिसर्च बहुत गहरी होती है और बात जब ऐसे फिल्मी सितारों की हो जिनकी ज़िंदगी के कई रहस्य कभी सामने आ ही नहीं पाते, तो ऐसे में यासिर की रचनाएं उन सभी रहस्यों पर से बहुत दिलचस्प तरीके से परदा हटाती हैं. यासिर द्वारा बॉलीवुड एक्टर ‘संजय दत्त’ पर लिखी गई किताब थोड़ा-बहुत विवादों के घेरे में भी रही, क्योंकि संजय दत्त का कहना था कि किताब उनकी अनुमति के बिना लिखी गई है, लेकिन किताब जब प्रकाशित हुई तो इसने कई सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए. लोगों के बीच इस किताब को ख़ासा पसंद किया गया और यासिर को पाठकों का भरपूर प्यार मिला. अगर ये कहा जाए कि ‘गुरु दत्त : एन अनफिनिश्ड स्टोरी’ यानी कि ‘गुरु दत्त : एक अधूरी दास्तान’ गुरु दत्त पर लिखी गई अब तक सभी पुस्तकों में सबसे ऊपर है, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी.

बेस्टसेलिंग बॉलीवुड बायोग्राफी राइटर यासिर उस्मान की यह किताब भारतीय सिनेमा के विलक्षण और महान सितारे गुरु दत्त पर एक संपूर्ण रिसर्च है. किताब के शुरू होने से लेकर अंत तक, गुरु दत्त पर ऐसा कोई सवाल बाकी नहीं रह जाता जिसके बारे में बात की जाए. इस किताब में गुरु की ज़िंदगी से जुड़े हर सवाल का जवाब मौजूद है. किताब में हर पल की कहानी को किस तरह बुनना है- पहली घटना को दूसरी घटना से कैसे जोड़ना है… एक अध्याय के खत्म होते ही दूसरे अध्याय को कहां से पकड़ना है… जैसी कई ज़रूरी बातों का बेहद बारीकी से ख्याल रखा गया है. यह किताब गुरु दत्त की प्रमाणिक जीवनी की तरह उभर कर सामने आती है, साथ ही किताब भारतीय सिनेमा की दुनिया की प्रसिद्ध हस्तियों के असाधारण जीवन की कई परतें खोलते हुए मनुष्य की भावनात्मक और मानसिक सेहत का अविश्वसनिय ब्योरा देती है. खत्म होते ही किताब खामोशी की एक ऐसी दुनिया में छोड़ देती है, जहां मस्तिष्क में ढेर सारे चित्र उभरते हैं, ऐसा लगता है मानो किसी किताब को नहीं पढ़ा है, बल्कि उन सारी गलियों से गुज़र कर अभी-अभी आए हैं, जहां गुरु दत्त के कदमों के निशान अब भी बाकी हैं.

गुरु दत्त की ऐसी कई फिल्में हैं जिन्हें भारत में अब तक बनीं सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में बहुत ऊपर रखा जाता है. 1957 में आई उनकी फिल्म ‘प्यासा’ को टाइम मैगज़ीन ने साल 2005 में सर्वकालीन 100 महान फिल्मों में शामिल किया था. ये सच है कि गुरु दत्त की फिल्में दुनिया भर के दर्शक, समीक्षक और सिनेमा के छात्र आज भी देखते और सराहते हैं. उनकी फिल्में न केवल तकनीकी गुणवत्ता के लिए जानी जाती हैं, बल्कि रोमांसवाद, जीवन की रिक्तता और भौतिक सफलता के उथलेपन के लिए भी प्रसिद्ध हैं. भारतीय सिनेमा में गुरु दत्त का नाम हमेशा अमर रहेगा और यासिर उस्मान की किताब ‘गुरु दत्त : एक अधूरी दास्तान’ एक तरह से गुरु दत्त को श्रद्धांजलि है, जिसे लेखक ने पूरी शिद्दत के साथ डूब कर रचा है.

यासिर ने वहीदा रहमान से लेकर देव आनंद, जॉनी वॉकर, इस. डी. बर्मन जैसे करीबी दोस्तों, सहयोगियों और गुरु दत्त की बहन ललिता लाज़मी के हवाले से उनके छोटे लेकिन संपूर्ण जीवन को इस किताब में उतार कर रख दिया है. किताब को पढ़ते हुए ये महसूस होता है, कि हर बात को बहुत सावधानीपूर्वक और सलीके से कहा जा रहा है. गुरु की ज़िंदगी से जुड़े हर व्यक्ति की अपनी एक अलग कहानी है जिसे जानने के बाद पाठक किसी को भी दोष नहीं देना चाहेगा. क्योंकि गुरु की ज़िंदगी और मृत्यु को लेकर कई किस्से बुने जाते रहे हैं, इल्ज़ाम उनकी पत्नी गीता दत्त पर भी लगे, लेकिन किताब इस सच से भी परदा उठाती है. बहुत आसान होता है, एक पुरुष की ज़िंदगी में आई विपत्तियों, दु:खों और परेशानियों के लिए उस स्त्री को ज़िम्मेदार ठहराना जो उस पुरुष के सबसे करीब होती है, लेकिन असल में इंसान या रिश्ते गलत नहीं होते, परिस्थितियां कभी-कभी उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर चली जाती हैं. अपनी ज़मीन पर खड़े होकर सामने के खड़े व्यक्ति की असलियत को नहीं जाना जा सकता. किसी भी फैसले से पहले दोनों ज़मीनों का अपना अलग-अलग सच और अलग-अलग वजूद होता है.

प्रस्तुत हैं यासिर उस्मान की ‘गुरु दत्त : एक अधूरी दास्तान’ किताब से वो अंश, जो वहीदा रहमान और गुरु दत्त के रिश्ते की शुरुआत का साक्षी है…

पुस्तक अंश : एक्सीडेंट और वहीदा रहमान
‘वह मुलाक़ात महज़ एक इत्तेफाक लग रही थी, लेकिन नियति को पता होगा कि मेरे दिन बदल गए…’
-वहीदा रहमान

प्यासा के लिए महिला पात्रों की कास्टिंग में कई बदलाव किए गए थे. जो भूमिका माला सिन्हा ने निभाई, वह शुरू में मधुबाला को निभानी थी. वेश्या की सहेली की भूमिका के लिए मीनू मुमताज को साइन किया गया था जबकि ‘जाने क्या तूने कही’ गाना कुमकुम पर फिल्माया जाना था. हालांकि फ़ाइनल कट में मीनू मुमताज और कुमकुम, दोनों बाहर हो गई थीं.

एक अपेक्षाकृत नई अभिनेत्री वहीदा रहमान को नायक और कवि विजय (गुरु दत्त) के साथ गुलाबो वेश्या की मुख्य भूमिका निभाने के लिए चुना गया. शुरू में गुरु दत्त की टीम उनकी कास्टिंग से खुश नहीं थी. यह एक कठिन भूमिका थी जिसके लिए किसी परिपक्व और अनुभवी अभिनेत्री की ज़रूरत थी और वहीदा ने तब तक केवल एक फिल्म की थी. हालांकि गुरु दत्त को इसमें कोई संदेह नहीं था. अबरार अल्वी ने बताया कि शुरू में कम से कम गुरु दत्त के अंदर के रोमांटिक इंसान ने वहीदा में अपने रचनात्मक और बौद्धिक झुकाव की एकदम सही झलक देख ली थी.

वहीदा से मिलने के बाद गुरु दत्त का सिनेमा पहले जैसा रहा ही नहीं. हालांकि वहीदा से उनकी मुलाक़ात कैसे हुई, यह केवल नियति थी.

वहीदा रहमान का जन्म मद्रास शहर (तमिलनाडु) से पैंतालीस मील दूर चेंगलपट्टू के छोटे-से शहर में 3 फरवरी 1938/39 को हुआ था. उनके पिता मोहम्मद अब्दुल रहमान जिला कमिश्नर थे और मां मुमताज बेगन गृहिणी थीं. वहीदा अपनी चार बहनों में सबसे छोटी थीं. नौ साल की उम्र में वहीदा अपनी बहनों के साथ राजमुंदरी में भरतनाट्यम सीखने चली गईं. लेकिन तभी एक दुखद घटना हो गई.

जब वहीदा तेरह साल की थी तभी उनके पिता का देहांत हो गया था. अब नियमित आमदनी नहीं होने के कारण वहीदा और उनकी बड़ी बहन सईदा ने मंच पर प्रदर्शन करना शुरू कर दिया, लेकिन यह कमाई उनके परिवार को चलाने के लिए पर्याप्त नहीं थी. तभी एक क़रीबी पारिवारिक मित्र और फिल्म निर्माता रामकृष्ण प्रसाद ने वहीदा को अपनी तेलुगु फिल्म रोजुलु मरई (जिसका अर्थ होता है, ‘समय बदल गया है’) में एक नृत्य-गीत की पेशकश की. यह गाना सुपर हिट रहा और अपने नृत्य की बदौलत वहीदा रातों-रात स्टार बन गईं. इस गीत के ज़रिए ही वहीदा रहमान गुरु दत्त से मिलीं और फिर उन्होंने उनके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

यह मुलाकात हैदराबाद में हुई थी.

गुरु दत्त के एक दक्षिण भारतीय वितरक ने उन्हें एक तेलुगु फ़िल्म, मिसियम्मा के बारे में बताया में बताया, जो वहां हिट रही था. उसने सुझाव दिया कि इस फिल्म का हिंदी में रीमेक बनाना एक अच्छा आइडिया हो सकता है. उन्होंने गुरु दत्त को हैदराबाद आने और फिल्म देखने के लिए कहा जो हाउसफुल चल रही थी. गुरु दत्त मान गए.

तय हुआ कि गुरु दत्त की कार में हैदराबाद सड़क मार्ग से जाया जाएगा. अबरार अल्वी और गुरुस्वामी उनके साथ रहेंगे. वे लोग उसी शाम को रवाना हो गए, रात भर गाड़ी चलाई और अगली सुबह हैदराबाद पहुंच गए. हालांकि तभी एक हादसा हो गया. ड्राइवर थका हुआ था और की एक भैंस से टक्कर हो गई. गुरु दत्त की प्लायमाउथ कार को छोड़कर किसी को कोई नुक़सान नहीं हुआ. कार बुरी तरह से टूट-फूट गई थी और मैकेनिक ने उन्हें बताया कि इसे ठीक करने में अब तीन दिन लग जाएंगे. फिल्म देखने के लिए एक दिन की यात्रा अब तीन दिनों के लिए बढ़ गई थी. इससे भी बुरी बात यह रही कि गुरु दत्त ने आख़िरकार जब मिसियम्मा फिल्म देखी तो उन्हें यह पसंद नहीं आई. इस यात्रा की बर्बादी पर वे बहुत चिढ़ गए थे, क्योंकि उससे कुछ भी हासिल नहीं हुआ था. लेकिन उनके पास दो दिन और थे. समय बिताने के लिए वे अपने एक फिल्म वितरक से मिलने गए और फिर, भाग्य ने अपना खेल दिखा दिया.

गुरु दत्त और अबरार अल्वी डिस्ट्रीब्यूटर के ऑफिस में बैठे थे, तभी उन्हें बाहर शोरगुल होता सुनाई दिया. गुरु दत्त कुछ युवाओं को गौर से देख रहे थे जिन्होंने वहां रुकी एक कार को घेर लिया था. कार का दरवाज़ा खुला और एक लड़की कार से बाहर निकली. गुरु दत्त ने वितरक की ओर आश्चर्य भरी नज़र से देखा. उसने गुरु दत्त से कहा, ‘यह वहीदा रहमान है,’ और बताया कि इस लड़की ने फिल्म रोजुलु मरई में केवल एक डांस नंबर किया है, लेकिन वह डांस नंबर सनसनी बन चुका है. फिल्म धमाकेदार तरीके से सफल हुई थी और नर्तकी वहीदा युवाओं के बीच लोकप्रिय हो गई थीं.

भाग्य अपना खेल खेल रहा था. वहीदा मद्रास से बाहर थीं, लेकिन रोजुलु मरई की सफलता के कार्यक्रम के लिए उसी समय हैदराबाद आई थीं, जब गुरु हैदराबाद की बिना तय की गई यात्रा पर थे.

वहीदा रहमान याद करते हुए बताती हैं, ‘रोजुलु मरई ने हैदराबाद में अपना 100वां दिन पूरा किया था. गुरु दत्त साहब उस समय हैदराबाद में थे और उन्होंने थिएटर के बाहर बहुत ज़्यादा भीड़ देखी थी.’

गुरु दत्त आश्चर्यचकित रह गए थे ‘वहीदा रहमान? यह तो मुस्लिम नाम है. क्या वह उर्दू बोल लेती है?’ उन्होंने वितरक से मीटिंग अरेंज करने को कहा. ‘मैंने तब तक ना तो उनकी फिल्में देखी थीं और ना ही उनका नाम सुना था, मुझे नहीं पता था कि वे कौन हैं.’ अगले दिन वहीदा अपनी मां के साथ मिलने के लिए आईं. गुरु दत्त से उनकी यही पहली मुलाक़ात थी.

वहीदा रहमान वैसी कोई सनसनी नहीं लग रही थीं, जैसा कि वितरक ने बताया था. वे सादा कपड़ों में थीं और बहुत कम बोलती थीं. गुरु दत्त भी ज़्यादा नहीं बोले. उन्होंने उनकी पृष्ठभूमि के बारे में पूछा कि क्या वे उर्दू बोल सकती हैं और क्या उन्होंने नृत्य सीखा है. वहीदा नें हूं-हां में जवाब दिया. कुछ ही देर में मीटिंग खत्म हो गई. अपनी पहली मुला़ात को याद करते हुए वहीदा ने बताया, ‘जब मैं उनसे पहली बार 1955 में मिली थी तो उन्होंने मुश्किल से एक या दो वाक्य बोले होंगे. वह मुलाकात महज़ एक इत्तेफाक लग रही थी, लेकिन नियति को पता होगा कि मेरे दिन बदल चुके हैं…”दिन बदल चुके हैं” को तेलुगु में रोजुलु मरई कहते हैं जो कि मेरी फ़िल्म थी.’

वितरक ने यह भी सुझाव दिया कि बंबई जाने से पहले गुरु दत्त को रोजुलु मरई का उनका डांस नंबर देखना चाहिए. रील का इंतज़ाम किया गया. इस बीच गुरु दत्त और दोस्तों ने दोपहर का समय बियर पीने और भोजन करने में बिताया. अबरार अल्वी ने लेखिका सत्या सरन की किताब टेन इयर्स विद गुरु दत्त में बताया है, ‘जब तक हम प्रोजेक्शन रूम में पहुंचे, हम छह बोतलें पीकर फेंक चुके थे और ज़्यादा संभावना इसी बात की थी हम लोग खुशनुमा मूड में थे. रील दिखाई गई. डांस नंबर तेज़ गति और अच्छी तरह से संपादित किया गया था, लेकिन उसमें नर्तकी का एक भी शॉट क्लोज़-अप में नहीं था. “वह कैसी है?” गुरु दत्त ने पूछा, “बहुत फ़ोटोजेनिक,” मैंने जवाब दिया. मुझे भी ऐसा लगता है, गुरु दत्त ने कहा था.’

बात यहीं खत्म हो गई थी. उसके बाद उन्होंने वहीदा से चर्चा नहीं की. कार ठीक हो गई थी और वे लोग बंबई वापस आ गए. गुरु दत्त अब ज़्यादा चिंतित थे, क्योंकि इस हादसे के कारण उनका इतना सारा वक्त बर्बाद हो गया था जो मिसियम्मा फिल्म के कारण हुआ था जिसे देखने के लिए वे हैदराबाद असल में गए थे. वे इसका रिमेक बनाने नहीं जा रहे थे. इसका मतलब यह भी था कि गुरु दत्त के हाथों में प्यासा के पहले कुछ नहीं था.

वहीदा ने बाद में बताया था, ‘मैंने उस मीटिंग को ज़्यादा अहमियत नहीं दी और उसके बारे में भूल गई थी, लेकिन वे नहीं भूले थे.’

कुछ महीने बाद, गुरु दत्त नें अपनी फिल्म सी.आई.डी. में उन्हें एक साइड रोल देकर ब्रेक दिया, लेकिन उनका नृत्य-गीत ‘कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना’ बहुत ज़्यादा हिट हुआ और मुख्य नायिका शकीला से भी ज़्यादा चर्चा उनकी हुई. वहीदा रहमान से प्रभावित फिल्म पत्रिकाओं ने ऐलान कर दिया कि गुरु दत्त ने अपने महत्त्वकांक्षी प्रोजेक्ट प्यासा में उन्हें अहम रोल दे दिया है.

इसके साथ ही इस नए गुरु-शिष्या के रिश्ते के बारे में फ़िल्म उद्योग के गलियारों में चर्चा होने लगी थी.

Tags: Bollywood, Book, Hindi Literature, Hindi Writer, Literature

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