Saturday, May 18, 2024
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दुःख के एकांत में जब मैं कराहूं मौन, ध्यान में देखूं तुम्हीं को और है ही कौन : त्रिलोचन शास्त्री

कहानी, गीत, ग़ज़ल और आलोचना से हिंदी साहित्य को समृद्ध करने वाले त्रिलोचन शास्त्री आधुनिक हिंदी कविता की प्रगतिशील त्रयी के तीन स्तंभों में से एक हैं. उन्हें हिंदी सॉनेट का शिखर पुरुष भी कहा जाता है. वह बाजारवाद के धुर विरोधी थे, लेकिन उन्होंने हिंदी में प्रयोगधर्मिता का हमेशा समर्थन किया. उनका मानना था, कि ‘भाषा में जितने प्रयोग होंगे वह उतनी ही समृद्ध होगी’, जिसके चलते उन्होंने नवसृजन को प्रोत्साहित किया.

त्रिलोचन को हिंदी अकादमी ने ‘शलाका पुरस्कार’ से सम्मानित किया और हिंदी साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हे ‘शास्त्री’ और ‘साहित्य रत्न’ जैसी उपाधियों से समादृत किया गया. साल 1982 में ‘ताप के ताए हुए दिन’ के लिए वह ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित हुए, साथ ही उन्हें उत्तर प्रदेश ‘हिंदी समिति पुरस्कार’, ‘हिंदी संस्थान सम्मान’, ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’, ‘भवानी प्रसाद मिश्र राष्ट्रीय पुरस्कार’, ‘सुलभ साहित्य अकादमी सम्मान’, ‘भारतीय भाषा परिषद सम्मान’ से भी सम्मानित किया गया.

निजी जीवन में हमेशा परेशान हाल रहे हिंदी के शीर्ष कवि त्रिलोचन की असली शिनाख्त उनके शब्दों से होती है. वे अरबी, फारसी में भी निष्णात होने के साथ-साथ पत्रकारिता में भी सक्रिय रहे और हंस तथा आज जैसी पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया. हिंदी साहित्य को उन्होंने ऐसी-ऐसी अनमोल रचनाएं दीं, जो जुबान पर एक बार चढ़ जाएं तो फिर जीवन में कभी भूलें नहीं. उनका पहला कविता संग्रह 1945 में प्रकाशित हुआ, ‘जीने की कला’, ‘मेरा घर’, ‘ताप के ताए हुए दिन’, ‘चैती’, ‘देशकाल’, ‘अनकहनी भी कुछ कहनी है’, ‘धरती’, ‘दिगंत, ‘गुलाब और बुलबुल’, ‘अरधान’, ‘उस जनपद का कवि हूं’, ‘फूल नाम है एक’ और ‘सबका अपना आकाश’ उनकी लोकप्रिय पुस्तकें हैं. प्रस्तुत हैं उनके काव्य-संग्रह ‘सबका अपना आकाश’ से चुनिंदा कविताएं…

1)
हरा भरा संसार है
हरा भरा संसार है आंखों के आगे
ताल भरे हैं, खेत भरे हैं
नई नई बालें लहराए
झूम रहे हैं धान हरे हैं
झरती है झीनी मंजरियां
खेल रही है खेल लहरियां
जीवन का विस्तार है आंखों के आगे

उड़ती उड़ती आ जाती है
देस देस की रंग रंग की
चिड़ियां सुख से छा जाती हैं
नए नए स्वर सुन पड़ते हैं
नए भाव मन में जड़ते हैं
अनदेखा उपहार है आंखों के आगे

गाता अलबेला चरवाहा
चौपायों को साल संभाले
पार कर रहा है वह बाहा
गए साल तो ब्याह हुआ है
अभी अभी बस जुआ छुआ है
घर घरनी परिवार है आंखों के आगे

2)
हो गया मुझको विश्वास
हो गया है मुझ को विश्वास
श्वास है जीवन का आभास
कहो मत, रहो मौन दिन रात
सहो जीवन के संचित भोग
भाग कर यहां बचा है कौन
अटल है कर्मों के संयोग
यही है जीवन का इतिहास

मरण जीवन से कितनी दूर
कर रहा छिप कर शर संधान
चल रहा है जग दुखी उदास
न कुछ भी ज्ञान न कुछ अनुमान
इसी में है घट का उल्लास

जगाता है लहरों को पवन
सरोवर के उर में एकांत
डोलते चंचल कमल कलाप
यही है गति, रति में उद्भ्रांत
मुग्ध भौरे का सौरभ लास

3)
तुम चले, चलते रहे

तुम चले, चलते रहे, छूटे पथिक साथी तुम्हारे
मौन आंखों में तुम्हारी
कौन सा विश्वास फड़का
नाड़ियों में रक्त भरने
के लिए ही हृदय धड़का
मन अचंचल है सधा तन
उच्च शिर, उर व्याप्त गुंजन
नापते हो तम धरातल एक निश्चय भाव धारे

क्षितिज में सोया हुआ था
सामने पर्वत खड़ा है
कब रूके तुम, कब थके तुम
पांव शेखर पर पड़ा है
दीर्घ कर जैसे बढ़ा कर
शीश पर अपने चढ़ा कर
मत्त गज सा अद्रि समुदित सूर्य की पूजा संवारे

नद नदी ने पांव धोए
पुष्प पादप ने चढ़ाए
मेघ ने सित छत्र ताना
वायु ने चामर हिलाए
इंद्रधनु नत सूर्य ने दी
चंद्र ने दीपावली की
तुम न हारे देख तुम को दूसरे जन भी न हारे

4)
मुझे बुलाता है पहाड़
मुझे बुलाता है पहाड़ मैं तो जाऊंगा

निर्मल जल के वे झरने कल
बैठ जहां अविपालों के दल
देते काट दुपहरी के पल
वहीं उन्हीं के सुख दुख से घुलमिल जाऊंगा

नभ में नीरव चंचल बादल
रूई के गाले से उज्ज्वल
बिखर रहे होंगे दल के दल
लेता हुआ हवा छांही से लख पाऊंगा

संकट से चल मेषों के दल
चरते होंगे चंचल चंचल
विस्तृत होगा हरा भरा स्थल
गीत गड़रियों के सुन सुन कर दुहराऊंगा

चोटी से चोटी पर जा कर
रुक कर, गीत स्वप्नमय गा कर
रूखी सूखी रोटी खा कर
वृक्ष लताओं के परिचय में फिर आऊंगा

वे मजूर से राजा रानी
सुख दुख वाली दुनिया जानी
अपनी ही तो सांस कहानी
अपनेपन की ही लहरों को दिखलाऊंगा

5)
मैं तुम्हें फिर फिर पुकारूं
मैं तुम्हें फिर फिर पुकारूं तुम न बोलो

धड़कनों में इस हृदय की
हो तुम्हारा नाम
शून्य नयनों में प्रतीक्षा
प्राणमय आयाम
मैं विजन पथ पर चलूं
गति में ढलूं
बंद पाऊं द्वार उठ कर तुम न खोलो

दुःख के एकान्त में जब
मैं कराहूं मौन
ध्यान में देखूं तुम्हीं को
और है ही कौन
यह व्यथा नीरव कहूं
दृग में बहूं
इन मलिन धूसर दिनों को तुम न तोलो

Tags: Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer, Literature, Poem

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