Thursday, June 13, 2024
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‘जिस्म-फ़रोशी करने वाली हर औरत वेश्या नहीं होती, मां भी हो सकती है!’ भीतर तक झकझोर देती है मक्सिम गोर्की की कहानी ‘नीली आंखों वाली स्त्री’

28 मार्च, 1868 को जन्मे मक्सीम गोर्की का पूरा नाम ‘अलिक्सेय मक्सीमविच पेश्कोव’ था. कम उम्र में ही माता-पिता की मृत्यु हो जाने के कारण उन्हें उनके नाना-नानी ने पाला था. अपने बचपन पर गोर्की ने एक पुस्तक भी लिखी थी, जिसका नाम है ‘मेरा बचपन’. गोर्की की अधिकतर पुस्तकें उनके अपने जीवन से ली गई सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं और काफी कुछ आसपास घटने वाली घटनाओं से. उनका बचपन कई तरह के अभावों और संघर्षों में गुज़रा. कम उम्र में ही उन्हें मजदूरी भी करनी पड़ी और थोड़े बड़े होने पर उन्होंने पत्रकारिता करते हुए ज्ञानार्जन किया. ‘मां’ गोर्की की सबसे चर्चित पुस्तक है. आपको बता दें, कि गोर्की वैसे तो रशियन लेखक थे, लेकिन उनकी पहली रचना अंग्रेज़ी में प्रकाशित हुई थी.

गोर्की ने अपने देश की दुर्दशा को बेहद करीब से देखा और जिया भी था, जिसका अहसास उन्हें पढ़ते हुए गहराई से होता है. रूस के हालातों को देखते हुए वे क्रांतिकारी बन गए और कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए. रूस की क्रांति को आमंत्रित करने वाले अमर नायको में मक्सीम गोर्की का नाम सदैव आदर से लिया जाता है. उनके लेखन ने जीवन के सच को लेकर ऐसा बहुत कुछ रचा जिसने लाखों करोड़ों की संख्या में लोगों को प्रभावित किया और एक नई क्रांति को जन्म दिया.

मक्सीम गोर्की की कहानी ‘नीली आंखों वाली स्त्री’ एक ऐसी औरत की कहानी है, जो सामाजिक तौर पर तो धंधा करती है, लेकिन वो वेश्या नहीं बल्कि एक मां है. पति की मृत्यु के बाद एक अकेली औरत अपने बच्चों को पालने के लिए किस स्तर तक स्वयं को खत्म करके उनके अच्छे भविष्य के लिए वेश्यावृत्ति के काम में खुद को झोंक देती है और समाज से लड़ती है, इसका इस कहानी में गोर्की ने मार्मिक वर्णन किया है. मां के मन:स्थिति को कम शब्दों में गोर्की ने भावों और हरकतों के माध्यम से कहानी में गहराई से रचा है, जिसे पढ़ते हुए कई तरह के दुख और तकलीफें उनके बिना लिखे भी समझ में आते हैं. मां बनने के बाद एक औरत की प्राथमिकता सिर्फ उसके बच्चे होते हैं, फिर उसके लिए मां को जो भी करना पड़े, वो इस बात से बिल्कुल नहीं झिझकती- समाज क्या सोचेगा, दोस्त-रिश्तेदार क्या सोचेंगे. एक मां के लिए सबकुछ बहुत बाद में आ जाता है, सबसे ऊपर यदि कुछ होता है, तो वह होते हैं उसके बच्चे. एक तरह से देखा जाए तो मजबूर मां के लिए दुनिया न तब अलग थी और न ही आज अलग है. इतने सालों में पूरी दुनिया में कुछ नहीं बदला. इस कहानी को गोर्की ने साल 1895 में लिखा था, ऐसे में इस कहानी को यदि कालजयी की श्रेणी में रखा जाए, तो इसमें कोई संदेह नहीं. प्रस्तुत है गोर्की की मार्मिक कहानी ‘नीली आंखों वाली स्त्री’-

मक्सीम गोर्की : नीली आंखों वाली स्त्री
सहायक पुलिस-अफ़सर पोदशिबलो यूक्रेन का निवासी था- मोटी और उदास प्रकृति. दफ्त़र में बैठा वह अपनी मूंछों में बल डाल रहा था और उदास मुंह बनाए खिड़की से बाहर पुलिस स्टेशन के हाते में ताक रहा था. दफ्त़र अंधेरा, दमघोंट और बहुत ही निस्तब्ध था. घण्टे के पेंडुलम की टिकटिक के सिवा, जो एक सुर से घड़ियां गिन रहा था, और कोई आवाज़ नहीं आ रही थी. बाहर अहाता ख़ूब उजला था और बरबस हृदय को खींचता था. उसके बीच में उगे बर्च के तीन वृक्ष भरपूर छांह किए थे और इस छांह में पुलिसमैन कुख़ारिन जो अभी अपनी ड्यूटी पूरी करके लौटा था, घास के एक ढेर पर, जो आग बुझाने वाले घोड़ों के लिए वहां जमा थी, पड़ा सो रहा था. यही वह दृश्य था जिसने सहायक पुलिस अफ़सर पोदशिबलो का पारा गरम कर दिया था. उसका मातहत सो सकता था जबकि उसे, अभागे चीफ़ को, इस दड़बे में बैठना और दमघोंट हवा में सांस लेना पड़ रहा था. पत्थर की दीवारें गन्ध छोड़ रही थीं. उसने कल्पना की, कितना आनन्द आता अगर वह वहां, बर्च वृक्षों की छाया में भीनी गन्धवाली घास के उस ढेर पर, सो पाता. लेकिन इसका समय कहां था? फिर उसका पद भी इसकी इजाज़त नहीं देता था. सो, सोचते- सोचते, उसने अपने बदन को ताना, जम्हाई ली और पहले से और भी अधिक खीझ उठा. उसके हृदय में पुलिसमैन कुख़ारिन को जगाने की इच्छा इतने ज़ोरों से उभरी कि दबाए न दबी.

“एइयू, कुख़ारिन! ऐ सुअर, कुख़ारिन!” वह गरजा.

उसके पीछे का दरवाज़ा खुला और किसी ने भीतर पांव रखा. पोदिशबलो, पहले की भांति, खिड़की से बाहर देखता रहा, न तो उसने पलटकर पीछे की ओर देखा और न ही यह जानने के लिए ज़रा-सी भी उत्सुकता प्रकट की कि कौन आया है और दरवाज़े के रास्ते में खड़ा अपने बोझ से फ़र्श के तख़्ते को चरचरा रहा है. कुख़ारिन पर उसके गरजने का कोई असर नहीं हुआ, वह कसमसाया तक नहीं. वह गहरी नींद में सो रहा था. अपने हाथ का उसने तकिया लगा रखा था, और उसकी दाढ़ी ऊपर को नोक किए आकाश से बतिया रही थी. सहायक पुलिस अफ़सर को लगा जैसे उसके मातहत के खर्राटे भरने की आवाज़ उसकी खिल्ली-सी उड़ा रही हो, झपकी लेने की उसकी अपनी इच्छा को उकसा रही हो और ऐसा न कर सकने पर उसे कोंच और कुरेद रही हो. इससे उसकी खीझ और भी तेज़ हो गयी. उसके जी में हुआ कि अभी उठकर जाए और कुख़ारिन की मोटी तोंद पर कसकर एक लात जड़े, फिर उसकी दाढ़ी पकड़कर खींचता हुआ उसे साए से बाहर ले आए और झुलसा देने वाली धूप में खड़ा कर दे.

“एइयू, वहां पड़ा खर्राटे भर रहा है. सुनता नहीं!”

“हुकुम, सरकार, ड्यूटी पर अब मैं हूं,” उसके पीछे से एक नर्म आवाज़ आयी.

पोदशिबलो घूम गया और उस पुलिसमैन पर अपनी चौंधिया देने वाली नज़र जमा दी जो सूनी आंखों से, दीदे फाड़े, उसकी ओर ऐसे देख रहा था कि कब हुकुम मिले जिसकी तामील में वह तुरत ज़मीन-आसमान एक कर दे.

“क्या मैंने तुम्हें बुलाया था?”

“नहीं, सरकार.”

“क्या तुम्हारी पेशी थी?” पोदशिबलो ने अपनी आवाज़ तेज़ की और अपनी कुर्सी में बल खाने लगा.

“नहीं, सरकार.”

“तब, अपनी खोपड़ी की ख़ैर चाहते हो तो यहां से फ़ौरन जहन्नुम रसीद हो जाओ!” उसका बायां हाथ किसी ऐसी चीज़ की टोह में मेज़ पर पहुंचा जिससे उसकी खोपड़ी की मरम्मत की जा सके और दाहिना हाथ मज़बूती से कुर्सी की पीठ को दबोचे था. लेकिन पुलिसमैन दरवाज़े में से चुपचाप पहले ही ग़ायब हो गया. उसका इस तरह जाना सहायक पुलिस अफ़सर को नहीं रुचा, उसे यह असभ्यतापूर्ण मालूम हुआ. इसके अलावा उसके लिए अपनी खीझ उतारना भी बेहद ज़रूरी था जिसे दफ्त़र की उमस, काम के बोझ, सोते हुए कुख़ारिन, आने वाले मेले और अन्य कितनी ही अप्रिय बातों ने बिना बुलाए दिमाग़ में घुसकर उकसा दिया था.

“इधर आओ!” वह दरवाज़े में से चिल्लाया.

पुलिसमैन लौट आया और दरवाज़े में तनकर खड़ा हो गया. उसके चेहरे पर भय का भाव झलक उठा था.

“बेवक़ूफ़!” पोदशिबलो गुर्राया, “आंगन में जाओ और उस गधे के बच्चे कुख़ारिन को जगाकर कहो कि थाने का आंगन खर्राटे भरने की जगह नहीं है. बस, दफ़ा हो जाओ!”

“अच्छा, सरकार. एक स्त्री थाने में आयी है और…”

“क्या-आ-आ?”

“एक स्त्री…”

“कैसी स्‍त्री?”

“लंबा क़द…”

“बेवक़ूफ़! वह क्या चाहती है?”

“आपसे मिलना…”

“पूछो, क्यों मिलना चाहती है. जाओ!”

“मैंने पूछा था. लेकिन उसने नहीं बताया. कहने लगी, वह ख़ुद सरकार से बात करना चाहती है.”

“अजीब मुसीबत हैं ये स्त्रियां भी. उसे यहां लिवा लाओ. क्या वह युवती है?”

“हां, सरकार!”

“अच्छा, उसे पेश करो. लेकिन जल्दी,” पोदशिबलो ने नर्म पड़ते हुए कहा. वह तनकर बैठ गया और मेज़ पर पड़े काग़ज़ों को उलटने-पलटने लगा.

उसने अपने उदास चेहरे पर अफ़सरियत का कठोर नक़ाब धारण कर लिया.

पीछे से स्त्री के स्कर्ट के सरसराने की आवाज़ सुनायी दी.

उसने आधा मुड़कर अपनी आसामी की ओर देखा और पैनी नज़र से उसका जायज़ा लेते हुए बोला, “मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं?”

बिना कुछ कहे, सिर झुकाए, उसने अभिवादन किया और धीरे-धीरे मेज़ की ओर तैर चली. उसकी भौंहें खिंची थीं और अपनी गंभीर नीली आंखों से वह अफ़सर की ओर देख रही थी. निम्न मध्य वर्ग की स्त्री की भांति वह मामूली और सीधे-सादे कपड़े पहने थी. उसके सिर पर एक शॉल पड़ा था और वह कंधों पर बिना आस्तीन का एक भूरा लबादा डाले थी जिसके छोरों को वह अपने छोटे-छोटे सुंदर हाथों की नाजुक उंगलियों से बराबर मसोस रही थी. उसका क़द लंबा, बदन गुदगुदा और वक्ष ख़ूब भरे-पूरे थे. उसका माथा ऊंचा और अधिकांश स्त्रियों से ज़्यादा गंभीर और कठोर था. उसकी उम्र सत्ताईस के क़रीब मालूम होती थी. वह बहुत ही धीरे-धीरे और विचारों में डूबी मेज़ की ओर बढ़ रही थी, मानो मन ही मन कह रही हो,

“क्या उल्टे पांव लौट जाना अच्छा न होगा?”

“नमूना बढि़या है, जिसे निशाना बनाए, उड़ा दे!” पहली ही झलक में पोदशिबलो ने सोचा, “मुसीबत की पुडि़या!”

“मैं जानना चाहती हूं”, हरी और समृद्ध आवाज़ में उसने कहना शुरू किया और फिर रुक गयी. उसकी नीली आंखें दुविधा में अफ़सर के गलमुच्छेदार चेहरे पर टिकी थीं.

“बैठ जाओ. अब बोलो, तुम क्या जानना चाहती हो?”

पोदशिबलो ने अफ़सरी अंदाज़ में पूछा और मन ही मन सोचा, “है बढि़या, पूरी रसभरी!”

“मैं उन कार्डों के लिए आयी हूं,” उसने कहा.

“कैसे कार्ड, रिहाइश के?”

“नहीं, वे नहीं.”

“तो फिर कौन से?”

“वे, जो…उन्हें दिए जाते हैं…स्त्रियों को,” उसने अटकते और लाज से लाल पड़ते हुए कहा.

“स्त्रियां? कैसी स्त्रियां? क्या मतलब है तुम्हारा?” अपनी भौंहों को उठाते और छेड़छाड़ के भाव से मुस्कुराते हुए पोदशिबलो ने पूछा.

“दूसरे प्रकार की स्त्रियां…वे, जो सड़कों पर घूमती हैं…रात को.”

“तक! तक! तक! तुम्हारा मतलब यह कि वेश्याएं?” पोदशिबलो की बत्तीसी खिल गयी.

“हां, मेरा मतलब यही है”, स्त्री ने एक गहरी सांस ली और मुस्कुरायी भी, मानो अब, जबकि वह शब्द उच्चारित हो चुका, उसका काम आसान हो गया.

“अरे, यह तुम क्या कहती हो? हां तो?…” पोदशिबलो ने उसे फिर उकसाया. वह किसी दिलचस्प रहस्य के प्रकट होने की आशा कर रहा था.

“हां, मैं उसी तरह के कार्डों के सिलसिले में आयी हूं”, स्त्री ने कहना शुरू किया और एक आह भरकर तथा अपने सिर को अजीब ढंग से झटका देते हुए, जैसे किसी ने उस पर आघात किया हो, कुर्सी पर ढह गयीं.

“समझा. सो तुम चकला चलाने की बात सोच रही हो?”

“नहीं, मैं ख़ुद अपने लिए एक कार्ड चाहती हूं,”, और उसका सिर झुकता चला गया, काफ़ी नीचे तक.

“ओह! तुम्हारा पुराना कार्ड कहां है?” अपनी कुर्सी को उसकी कुर्सी के और अधिक निकट खिसकाते और उसकी कमर की ओर अपना हाथ बढ़ाते हुए पोदशिबलो ने पूछा. उसकी एक आंख बराबर दरवाज़े पर टिकी थी.

“कैसा पुराना कार्ड? मेरे पास कोई कार्ड-वार्ड नहीं है,” पैनी नज़र से उसने उसकी ओर देखा, लेकिन उसके हाथ के स्पर्श से बचने का कोई प्रयत्न नहीं किया.

“सो तुम लुक-छिपकर धंधा करती थीं, क्यों? बिना नाम दर्ज कराए? कितनी ऐसा करती हैं. लेकिन अब तुम नाम दर्ज कराना चाहती हो. यह ठीक है. अधिक सुरक्षित”, उसे बढ़ावा देते और उसके बदन पर और भी अधिक खुलकर हाथ डालते हुए पोदशिबलो ने कहा.

“मैंने पहले कभी यह धंधा नहीं किया,” स्त्री के मुंह से निकला और उसने अपनी आंखें झुका लीं.

“क्या सचमुच? यह कैसे हो सकता है? मेरी समझ में नहीं आता,” अपने कंधों को बिचकाते हुए पोदशिबलो ने कहा.

“मैंने इस पर अभी सोचना शुरू किया है. पहली बार मेले में यहां आने पर,” धीमी आवाज़ में, अपनी आंखों को उठाए बिना, स्त्री ने स्पष्ट किया.

“सो यह बात है,” पोदशिबलो ने अपना हाथ उसकी कमर पर से हटा लिया, अपनी कुर्सी को फिर वापस खिसकाया और पीठ से कमर टिकाकर बैठ गया, खोया हुआ-सा.
दोनों के दोनों चुप थे.

“तो यह बात है. ठीक. तुम चाहती हो… ऊंह… यह ग़लत है. बेशक ग़लत है. और कठिन है. यानी, देखो न…लेकिन आखि़र… हां तो… बड़ी अजीब बात है… अगर सच पूछो तो मेरी समझ में नहीं आता कि तुम कैसे वह सब कर सकोगी. यानी, अगर तुम सचमुच वही करना चाहती हो जो तुम कहती हो.”

सहायक पुलिस अफ़सर अनुभवी था. उसने देखा कि सचमुच में बात ऐसी ही है. वह इतनी सहज, स्वस्थ और भली थी कि वह उस बदनाम धंधे की सदस्या नहीं बन सकती थी. इस धंधे के चिह्नों का, जो कि हर वेश्या के चेहरे पर अंकित होते हैं, चाहे वह कितनी ही नौसिखिया या अनुभवहीन क्यों न हो, उसमें अभाव था.

“आप सच कहते हैं,” उसके मुंह से निकला और विश्वास में उमड़कर उसकी ओर झुक गयी, “सच, मेरा रोम-रोम इसका साक्षी है. क्या मैं झूठ बोलूंगी, मैं, जो इस घिनौने धंधे तक को अपनाने का एकबारगी निश्चय कर चुकी हूं? निश्चय ही नहीं. लेकिन मुझे धन पैदा करना है. मैं विधवा हूं. मेरा पति, वह अगन-बोट चलाता था, पिछले अप्रैल में बर्फ़ तड़कने से डूबकर मर गया. मेरे दो बच्चे हैं, नौ साल का एक लड़का और सात साल की एक छोटी-सी लड़की. और पैसा एक नहीं. सगे-संबंधी भी कोई नहीं. जब मेरा विवाह हुआ, मैं अनाथ थी. मेरे पति के संबंधी बहुत दूर रहते हैं और वे मुझे भिखारी से अधिक नहीं गिनते. मैं किसका मुंह देखूं? मैं कोई मज़ूरी कर सकती थी, इसमें शक नहीं. लेकिन मुझे काफ़ी धन चाहिए, इतना अधिक, जितना कि मज़ूरी से मुझे कभी नहीं मिल सकता. मेरा लड़का स्कूल में पढ़ता है. मेरा ख़याल है कि उसकी फीस माफ़ कराने के लिए मैं दरख़्वास्त दे सकती हूं. लेकिन उस पर, मेरी जैसी अकेली स्त्री की दरख़्वास्त पर, कौन ध्यान देगा? और वह, इतना छोटा होते हुए भी, बहुत ही होशियार लड़का है. उसे स्कूल से उठाना अत्यंत बुरा होगा. और मेरी छोटी लड़की, उसके लिए भी दुनियाभर की चीज़ें चाहिए. जहां तक खरे धंधों का सवाल है, वे मिलते ही कहां हैं? और अगर कोई मिल भी जाए तो क्या कुछ मैं पाऊंगी और उससे क्या कुछ मैं कर सकूंगी? अगर बावर्ची का काम करूं? महीने में केवल पांच रूबल हाथ लगेंगे. यह काफ़ी नहीं है. क़तई काफ़ी नहीं है. जबकि इस धंधे में, अगर स्त्री का भाग्य चमक उठे तो, वह इतना अधिक पैदा कर सकती है कि अपने परिवार का पूरे एक साल तक पेट भर सकती है. पिछले मेले में हमारे गांव की एक स्त्री ने चार सौ से भी ज़्यादा रूबल बनाए थे. धन के इस अंबार के बल पर उसने जंगलों के वार्डेन से शादी कर ली और अब कुलीन घराने की स्त्री की भांति जीवन बिताती है. ख़ूब मौज से रहती है. अगर उसने वह न किया होता, उसकी लाज पर वह दाग़ न लगा होता. लेकिन तुम ख़ुद निर्णय करो. मुझे लगता है कि यह भाग्य का खेल है. हमेशा भाग्य ही सब कराता है. और जब यह विचार मेरे दिमाग़ में जम गया है, मैं समझती हूं कि भाग्य मुझसे यही कराना चाहता है. अगर मैं धन पैदा कर लेती हूं, अन्त भला तो सब भला, और अगर सिवा दुख और कलंक के और कुछ हाथ नहीं लगता, तो मेरा भाग्य! इस तरह मैं इसे देखती हूं.”

पोदशिबलो उसके हर शब्द को पकड़ रहा था, उसके लिए जैसे उसका संपूर्ण चेहरा बोल रहा था. पहले उसके चेहरे पर भय की एक झलक दिखी, लेकिन धीरे-धीरे उस दृढ़ निश्चय का भाव उसके चेहरे पर झलकने लगा.

सहायक पुलिस अफ़सर बड़ी बेचैनी का और एक हद तक सकपकाहट का भी अनुभव कर रहा था.

पहली बार उसे देखने पर उसके हृदय में आशंका उठी थी और उसने सोचा था, “इस जैसी स्त्री के हाथों किसी बेवक़ूफ़ के फंसने भर की देर है, यह जीते जी उसकी खाल उतार लेगी और उसकी हड्डियों पर ज़रा-सा भी मांस नहीं रहने देगी,”, लेकिन अब, उसकी कहानी सुनने के बाद, उसने रूखी आवाज़ में कहा, “मुझे दुख है कि मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकता. चीफ़ आफ पुलिस के पास अपनी दरख़ास्त भेजो. यह उसका काम है, और डॉक्टरी कमीशन का. मेरा इससे कोई वास्ता नहीं है.”

वह अब उससे छुटकारा पाना चाहता था. वह तुरत खड़ी हो गयी, अभिवादन में यूं ही ज़रा-सा सिर उसने झुकाया और धीरे-धीरे दरवाज़े की ओर तैर चली. पोदशिबलो, अपने होंठों को कसकर भींचे और आंखों को सिकोड़े, उसे जाता हुआ देखता रहा. उसकी पीठ पर थूकने से अपने को रोकने के लिए इसके सिवा वह और कर भी क्या सकता था?

“सो मुझे चीफ़ ऑफ़ पुलिस के पास जाना चाहिए?” दरवाज़े तक पहुंचने पर उसने घूमकर पूछा. उसकी नीली आंखें शांत संकल्प की दृढ़ता से उसे देख रही थीं और उसके माथे पर एक गहरी कठोर रेखा खिंची थी.

“हां, ठीक है,” पोदशिबलो ने तुरंत जवाब देकर उसे निबटा दिया.

“अच्छा तो विदा. धन्यवाद,” और वह बाहर निकल गयी.

सहायक पुलिस अफ़सर ने मेज़ पर अपनी कोहनियां टिका दीं. और वहां बैठा सीटी की आवाज़ में मन ही मन दसेक मिनट तक कुछ गुनगुनाता रहा.

“कुतिया, एह!” अपना सिर उठाए बिना वह ज़ोर से बड़बड़ा उठा, बच्चे! भला बच्चों का इससे क्या वास्ता? ऊंह, हरजाई कहीं की!”

और एक बार फिर वह चुप हो गया, काफ़ी देर के लिए.

“लेकिन यह जीवन कौन कम हरजाई है, उसने जो कुछ कहा अगर वह सच है तो. वह आदमी को अपनी कनकी उंगली पर नचाता है. सच्चा आदमी भी क्या करे, कहां सिर पटके? और फिर, एक क्षण रुककर, अपने मस्तिष्क की कारगुज़ारी की अंतिम आहुति के रूप में, उसने एक गहरी सांस ली, अपनी उंगलियों को चटखाया और ज़ोरों के साथ यह उद्गार प्रकट किया,

“छिनाल!”

“क्या आपने मुझे बुलाया था?”, डयूटी पर तैनात पुलिसमैन फिर दरवाज़े पर आ खड़ा हुआ.

“थू!…”

“क्या आपने मुझे बुलाया था, सरकार?”

“दफ़ा हो जाओ!”

“अच्छा, सरकार.”

“बेवक़ूफ़!” पोदशिबलो के मुंह से निकला और खिड़की से बाहर उसने नज़र डाली.

कुख़ारिन अभी भी घास के ढेर पर सो रहा था. स्पष्ट ही ड्यूटी पर तैनात पुलिसमैन उसे जगाना भूल गया था.

लेकिन सहायक पुलिस अफ़सर की झुंझलाहट ग़ायब हो चुकी थी, सोते हुए पुलिसमैन को देखकर अब उस पर ज़रा-सा भी असर नहीं हुआ. किसी चीज़ ने उसे आतंकित कर दिया था. उस स्त्री की शांत नीली आंखें उसकी कल्पना में तैर रही थीं. वे उसका पीछा नहीं छोड़ रही थीं. दृढ़ निश्चय के साथ सीधे उसकी ओर ताक रही थीं. इसने उसका हृदय बैठा दिया था और वह एक बेचैनी का अनुभव कर रहा था. घड़ी पर उसने एक नज़र डाली, अपनी पेटी को उसने कसा और फिर दफ्त़र से बाहर हो गया. “लगता है कि उससे फिर किसी समय मेरी भेंट होगी, भेंट होकर रहेगी,” वह बुदबुदा उठा.

और उसकी भेंट हुई.

सांझ का वक़्त था. बड़े दफ्त़र के सामने वह ड्यूटी पर खड़ा था. तभी, कोई पांच डग दूर, उसकी नज़र उस पर पड़ी. वह चौक की ओर जा रही थी- वैसे ही धीरे-धीरे, जैसे तैर रही हो. उसकी नीली आंखें सीधे सामने की ओर ताक रही थीं और उसकी समूची आकृति में, जो इतनी ऊंची और कमनीय थी, उसके पृष्ठ-भाग और वक्षों की हरक़त में, उसकी आंखों के उस निस्संग भाव में ऐसा कुछ था जो किसी को पास नहीं फटकने देता था. उसकी भौहों की गहरी रेखा ने, जो भाग्य के सामने अत्यन्त निरीहता की सूचक थी और जो अब, उस वक़्त की तुलना में, जबकि पहली बार उसने उसे देखा था, कहीं अधिक प्रत्यक्ष मालूम होती थी, उसके गोल रूसी चेहरे को अत्यन्त कठोर बनाकर बिगाड़ दिया था.

पोदशिबलो ने अपनी मूंछों को ऐंठा, मनोरंजक कल्पनाओं में रम गया और निश्चय किया कि वह उसे अपनी आंखों की ओट नहीं होने देगा.

“ज़रा ठहर तो, शैतान की पुडि़या कहां भागी जाती है!” मन ही मन उसने उसे चुनौती दी.

इसके पांच मिनट बाद चौक में पड़ी एक बेंच पर वह उसकी बग़ल में बैठा था.

“क्यों, मुझे पहचाना नहीं?” उसने मुस्कुराते हुए पूछा.

उसने अपनी आंखें उठाईं और शांत भाव से उस पर एक नज़र डाली.

“पहचाना. कहो, कैसे हो?” उसने खिन्न आवाज़ में कहा और उसे अपना हाथ तक नहीं भेंट किया.

“तुम सुनाओ, कैसे चल रहा है? क्या तुम्हें अपना कार्ड मिल गया?”

“यह रहा,” और वह, उसी निस्संग भाव से, अपने कपड़ों की जेब टटोलने लगी.

इससे वह अचकचा उठा.

“अरे नहीं, उसे दिखाने की ज़रूरत नहीं. मैं तुम्हारा यक़ीन करता हूं. इसके अलावा, मुझे कोई अधिकार नहीं है… मतलब यह कि… कैसे गुज़र रही है?” और इस प्रश्न के मुंह से निकलते ही उसने मन ही मन कहा, “जहन्नुम में जाए, मेरी बला से! और यह लाग-लपेट और अगल-बग़ल से तांक-झांक कैसी? क्या उसे छूते डर लगता है? सुनो, पोदशिबलो, क्यों नहीं एकदम खुलकर सीधे क़िस्सा पार कर लेते!”

लेकिन, इन तथा इस तरह की अन्य बातों से अपने-आप को लाख बढ़ावा देने पर भी, वह ‘एकदम खुलकर सीधे क़िस्सा पार नहीं कर सका. उस स्त्री में कुछ था जो आदमी को एक निश्चित प्रसंग को छेड़ने से रोकता है.

“कैसे गुज़र रही है? कोई ख़ास बुरी नहीं, भला हो उस…” वह आगे नहीं बोल सकी. उसके गाल शर्म से लाल हो उठे.

“तब तो बहुत अच्छा है. बधाई. लेकिन इस धंधे को निभाना बड़ा कठिन है, जब तक कि उसकी आदत न पड़ जाए. क्यों, ठीक है न?”

सहसा वह उसकी ओर झुक गयी, सफ़ेद और बल खाता हुआ चेहरा, गोल मुंह, लगता था जैसे वह रोने के लिए उमड़-घुमड़ रही हो, लेकिन वह उसी प्रकार सहसा पीछे भी हट गयी, अपने-आप को पीछे खींचकर वह फिर वैसी ही निस्संग हो गयी.

“ठीक है. मैं इसकी अभ्यस्त भी हो जाऊंगी,” उसने सुस्पष्ट और समतल आवाज़ में कहा, फिर रूमाल निकालकर ज़ोरों से अपनी नाक साफ़ की.

उसका सामीप्य, उसका हिलना-डोलना और उसकी शांत निश्चल नीली आंखें, पोदशिबलो को ऐसा मालूम हुआ जैसे वह भीतर ही भीतर किसी अतल गहराई में डूबा जा रहा हो.

उसकी घबराहट सीमा पार कर चली. वह बैठा न रह सका. वह उठ खड़ा हुआ और बिना एक शब्द मुंह से निकाले उसने अपना हाथ बढ़ा दिया.

“अच्छा तो अब विदा,” उसने धीमे से कहा.

उसने अपना सिर हिलाया और तेज़ डग भरता तथा अपनी बेवक़ूफ़ी पर अपने को कोसता वहां से चल दिया.

“लेकिन ज़रा ठहरो, मेरी शरीफ़ पतुरिया. तुमने अभी मेरा रंग नहीं देखा. एक दिन, जब तुम्हें पता चलेगा कि मैं क्या हूं, तो भूल जाओगी अपने हवाई घोड़े पर सवार होना!” वह मन ही मन बड़बड़ाया और साथ ही उसने यह भी अनुभव किया कि वह व्यर्थ ही उस पर अपना बुखार उतार रहा है. और इससे वह और भी अधिक झुंझला उठा.

अगले सप्ताह, एक दिन सांझ के समय, पोदशिबलो कारवां-सराय से साइबेरियाई घाट की ओर जा रहा था. तभी गाली-गलौज, स्त्रियों की चीख़-चिल्लाहट तथा अन्य कुत्सित आवाज़ें सुनकर वह रुक गया. ये आवाज़ें एक क़हवाख़ाने की खिड़की में से आ रही थी.

“मदद! पुलिस!” किसी स्त्री की मरमराती आवाज़ आयी. अचानक घूंसों की घनघनाहट, मेज़-कुर्सियों की उठा-पटक और इन सब आवाज़ों को डुबाती हुई एक आदमी की गहरी आवाज़.

“ख़ूब, बहुत ख़ूब! और, एक बार और सीधे थूथनी पर!” वह ज़ोरों से चिल्ला- चिल्लाकर उकसा रहा था.

सहायक पुलिस अफ़सर तेज़ी से दौड़कर सीढि़यों पर चढ़ गया, क़हवाख़ाने के दरवाज़े पर जमा तमाशा देखने वालों की भीड़ को धकियाता भीतर घुसा और यह दृश्य उसने देखा, नीली आंखों वाली उसकी परिचित स्त्री एक मेज़ पर पड़ी अपने बाएं हाथ से एक अन्य स्त्री के बालों को दबोचे थी और दाहिने हाथ से उस स्त्री के सूजे हुए मुंह पर तेज़ और निर्मम घूंसों की बौछार कर रही थी. अपनी नीली आंखों को वह बेरहमी से सिकोडे़ थी और उसके होंठ कसकर भिचे हुए थे. उसके मुंह के छोरों से ठोड़ी तक दो गहरी रेखाएं खिंची थी और उसका चेहरा, जो कभी इतना विकारशून्य था कि देखकर अचरज होता था, अब बनैले जन्तु की भांति निर्मम ग़ुस्से से तमतमा रहा था, एक ऐसे जीव का चेहरा, जो एक सहजाति को दारुण यंत्रणा देने और इसमें आनन्द लेने के लिए तत्पर था. जिस स्त्री पर वह प्रहार कर रही थी, वह केवल धीमी आवाज़ में भुनभुना रही थी, अपने को छुड़ाने का प्रयत्न कर रही थी और हवा में अपनी बांहें छटपटा रही थी.

पोदशिबलो को ऐसा अनुभव हुआ जैसे उसका समूचा रक्त तेज़ी से दिमाग़ की ओर दौड़ रहा हो. किसी से किसी चीज़ का बदला लेने की अंधी इच्छा से वह उतावला हो उठा और तेज़ी से आगे लपककर, क्रोध से पागल उस स्त्री की कमर को दबोच, उसे अलग खींच लिया. मेज़ उलट गयी. रकाबियां झनझनाकर फ़र्श पर जा गिरी. दर्शकों की बनैली चीख़ें और हंसी गूंज उठी. ग़ुस्से और झुंझलाहट में पोदशिबलो की आंखों के सामने सभी काट-छांट के चेहरे कौंध गए, हंसते हुए और लाल. स्त्री को वह अपनी बांहों में दबोचे था और वह हाथ-पांव पटक रही थी. वह उसके कानों के पास अपना मुंह ले गया और फुंकार उठा, “सो यह तुम हो, क्यों? इस तरह तमाशा खड़ा करती, उत्पात मचाती?”

नीली आंखों वाली स्त्री की शिकार, दूसरी स्त्री, टूटी रकाबियों के बीच फ़र्श पर पड़ी सुबकियां भर रही थी और सुध-बुध भूलकर कलप रही थी. नाटे क़द का एक चपल आदमी, जो लंबा कोट पहने था, पोदशिबलो को घटना का विवरण बता रहा था, “बात यह हुई, सरकार, कि उसने, जो वहां पड़ी है, इसे गाली दी. कहा, ‘हरजाई, कुतिया!’ सो इसने उसके एक तमाचा जड़ दिया और उसने इस पर चाय का गिलास फेंक मारा, और तब इसने उसका झोंटा पकड़कर चित कर दिया और, धमाधम! एक के बाद एक धमाधम! इसने उसे ऐसी मार पिलाई कि कोई भी उस पर गर्व कर सकता है. सच, बड़े मज़बूत पुट्ठे हैं इसके, इस स्त्री के.”

“मज़बूत पुट्ठे, क्यों?” स्त्री को अपनी बांहों में और भी ज़्यादा कसते हुए पोदशिबलो गरजा और ख़ुद उसका हृदय किसी से जूझने की भयानक इच्छा से विह्वल हो उठा.

लाल गरदन और चौड़ी पीठ वाला एक आदमी, खिड़की से बाहर अपनी गरदन निकाले और हास्यजनक ढंग से अपनी चौड़ी पीठ को कमान बनाए नीचे सड़क की ओर चिल्लाया, “ऐ कोचवान, इधर आओ!”
“चलो अब. पुलिस स्टेशन चलो. दोनों की दोनों. एइयू, उठकर खड़ी हो…और तुम कहां मर रहे थे अब तक? अपनी ड्यूटी का कुछ ख़याल नहीं? बेवक़ूफ़! ले जाओ इन्हें थाने, जल्दी करो. दोनों की दोनों को, समझे!”

पुलिसमैन पहले एक के और फिर दूसरी के बदन में डण्डा गड़ाता बहादुरी के साथ उन्हें खदेड़ ले गया.

“कनयक और सोडा-वाटर, जल्दी लाओ, चटपट!” खिड़की के पास एक कुर्सी पर ढहते हुए पोदशिबलो ने बैरा से कहा. थकान और हर किसी से तथा हर चीज़ से वह झुंझलाहट का अनुभव कर रहा था.

अगली सुबह वह उसके सामने खड़ी थी, वैसी ही शांत और दृढ़ जैसी कि वह पहली भेंट के समय थी. वह अपनी नीली आंखों से सीधे उसकी ओर देख रही थी और उसके बोलने की प्रतीक्षा कर रही थी.

पोदशिबलो ने, जिसे रात ढंग से नींद नहीं आयी थी और जो इस कारण और भी अधिक झुंझलाया हुआ था, मेज़ पर पड़े काग़ज़ों को इधर से उधर पटका, लेकिन इससे उसे कुछ मदद नहीं मिली और ऐसी कोई बात उसे नहीं सूझी जिसे वह उससे कहता. ये पक्षपातपूर्ण अभियोग और लांछनापूर्ण जुमले, जिनका ऐसे मौक़ों पर आमतौर से प्रयोग किया जाता है, उसके मुंह से नहीं ही निकले. वह उनसे कहीं अधिक ज़ोरदार और प्रतिशोधपूर्ण चीज़ उसके मुंह पर पटकना चाहता था.

“हां तो बोलो, उस झगड़े की शुरुआत कैसे हुई?”

“उसने मेरा अपमान किया,” स्त्री ने कहा.

“ओह, बहुत बड़ा अपराध किया!” पोदशिबलो ने व्यंग्य से कहा.

“उसे इसका कोई अधिकार नहीं था. मेरा उससे कोई मुक़ाबला नहीं किया जा सकता.”

“हे भगवान! तो तुम अपने को क्या समझती हो?”

“मैंने मजबूरी से इस धंधे को अपनाया है, लेकिन वह…”

“तो तुम्हारी राय में वह मौज-मज़े के लिए यह करती है. क्यों, यही न?”

“वह?”

“हां, वह!”

“उसके कोई बाल-बच्चे नहीं हैं.”

“बस करो, मोरी की कीच! क्या तुम समझती हो कि अपने बच्चों का रोना रोकर मुझे फुसला लोगी? इस बार तो मैं तुम्हें छोड़ दूंगा, लेकिन अगर तुमने फिर कोई गड़बड़ की तो चौबीस घंटों के भीतर तुम्हें यह नगर छोड़ देना पड़ेगा. मेले से अपने पांव दूर ही रखना. समझी! घबराती क्यों हो, तुम्हारी जैसियों को मैं ख़ूब समझता हूं. ज़रा-सी देर में ठीक कर दूंगा. उत्पात मचाती हो, क्यों? वह सबक पढ़ाऊंगा कि याद रखोगी, छिनाल कहीं की!” शब्द तेज़ी से, बिना किसी प्रयास के, उसके मुंह से निकल रहे थे, हर शब्द पिछले शब्द से अधिक अपमानजनक. स्त्री का चेहरा पीला पड़ गया था और उसने अपनी आंखों को ठीक वैसे ही सिकोड़ रखा था जैसे कि पिछली रात क़हवाख़ाने में उसने सिकोड़ा था.

“जाओ, दफ़ा हो जाओ यहां से!” मेज़ पर घूंसा मारते हुए पोदशिबलो चिल्ला उठा.

“भगवान ही तुम्हारा न्याय करेगा,” उसने रूखी और धमकी भरी आवाज़ में कहा और तेज़ डगों से दफ्त़र से बाहर चली गयी.

“न्याय की बच्ची!” पोदशिबलो चीख़ा. उसका अपमान करने में उसने सुख का अनुभव किया. उसके शांत और चिर विकारशून्य चेहरे से और जिस ढंग से अपनी नीली आंखों से सीधे उसकी ओर वह देखती थी उससे वह बुरी तरह झुंझला उठा था. पता नही, अपने को क्या समझती है? बच्चे? ग़लत, निरा बहाना! बच्चों का भला इससे क्या वास्ता? एक मामूली बेसवा, सड़कों की धूल चाटने वाली, मेले आयी कि धन कमाएगी लेकिन बनती है शराफ़त की पुतली! पता नहीं क्यों? एक शहीद, मजबूरी, बच्चे, भला किसके गले के नीचे उतरेगी यह ख़ुराफ़ात? इतनी हिम्मत है नहीं कि अपने को उसी रूप में देख सके जो कि वह है, सो परिस्थितियों के सिर दोष मढ़ ख़ुद अपने को दूध का धुला जताती है! वाह!

लेकिन बच्चे भी आखि़र थे ही. गोरे चेहरे का एक छोटा लड़का, लजीला, स्कूल की पुरानी फटी वर्दी पहने, कानों पर एक काला रुमाल बांधे, और एक छोटी लड़की, प्लेटदार मैकिन्टोश पहने, जो उसके बदन से काफ़ी बड़ी और ढीली-ढाली थी. दोनों काशिन घाट के तख़्तों पर बैठे शरद की हवा में कांप रहे थे और चुपचाप बतिया रहे थे. उनकी मां उनके पीछे खड़ी थी, कुछ गांठों की टेक लगाए और मुग्ध नीली आंखों से उन्हें देख रही थी. छोटे लड़के की शक्ल उससे मिलती-जुलती थी. उसकी आंखें भी नीली थीं. रह-रहकर वह अपना सिर उठाता, जिसपर वह ऐसी टोपी पहने था, जिसकी कलगी टूटी हुई थी, अपनी मां की ओर देखकर मुस्कुराता और कुछ कहता. छोटी लड़की के चेहरे पर बुरी तरह चेचक के दाग़ थे. छोटी-सी पैनी नाक और दो बड़ी-बड़ी भूरी आंखें, जिनमें चंचलता और समझदारी की चमक थी. घाट के तख़्तों पर उनके अगल-बगल, भांति-भांति के बंडल और पोटले-पोटलियां पड़ी थीं.

सितम्बर के अंत के दिन थे. सारे दिन बारिश पड़ती रही थी. नदी-तट पर कीचड़ फैली थी और ठंडी नम हवा चल रही थी.

वोल्गा नदी बढ़ी हुई थी. गंदली लहरें ज़ोरों से आवाज़ करती तट से टकरा रही थीं और हवा में एक धीमी थिर गूंज भरी थी. भांति-भांति के, सभी तरह के, लोग आ-जा रहे थे. उन सभी के चेहरों पर व्यग्रता की एक झलक थी, जैसे उन्हें अपने काम की उतावली हो. नदी के दृश्य की इस उमड़ती-घुमड़ती पृष्ठभूमि में एक मां और दो बच्चों की यह शांत तिकड़ी अपनी ओर तुरत ध्यान खींचती थी. सहायक पुलिस अफ़सर पोदशिबलो की नज़र उन पर पड़ चुकी थी, और, दूर खड़े रहने पर भी, वह इन तीनों को बड़ी बारीक़ी से देख रहा था. वह उनकी प्रत्येक हरक़त से अवगत था और, जाने क्यों, शर्म का अनुभव कर रहा था.

काशिन वाला स्टीम-बोट आधा घंटे में इस घाट से छूटकर वोल्गा के चढ़ाव की ओर जाने वाला था. लोग बाहर जैटी पर पहुंचने लगे थे.

नीली आंखों वाली स्त्री झुकी, थैलों और पोटले-पोटलियों को अपने कंधों तथा बग़ल में दाबकर सीधी हो गयी और सीढ़ियां उतरती चल दी. बच्चे उसके आगे चल रहे थे, हाथ में हाथ थामे और अपने हिस्से की पोटलियों को अपने कंधों पर रखे.

पोदशिबलो को भी बाहर जैटी पर पहुंचना था. वह चाहता तो यही था कि न जाए, लेकिन उसके सामने और कोई चारा न था. सो कुछ देर बाद वह भी वहां, टिकट-घर से कुछ दूर, जाकर खड़ा हो गया.

उसकी परिचित स्त्री टिकट ख़रीदने आयी. एक हाथ में वह अपना भारी बटुवा थामे थी जिसमें से नोटों की एक गड्डी बाहर झांक रही थी.

“मैं चाहती हूं,” उसने कहा, “…मतलब यह …ओह, बात यह है कि बच्चे तो दूसरे दर्जे में जाएंगे, कोस्त्रेमा …और मैं तीसरे में, लेकिन यह बताइए, क्या मैं उन दोनों के लिए एक ही टिकट नहीं ख़रीद सकती? नहीं? अपवाद रूप में, ख़ास तौर से, तो बना सकते हैं न? ओह धन्यवाद, बहुत-बहुत धन्यवाद! भगवान तुम्हारा भला करे.”

और वह टिकट लेकर चल दी. उसका चेहरा खिला हुआ था. बच्चे उससे चिपके जा रहे थे, घाघरा खींच-खींचकर उससे पूछ रहे थे. उसने उनकी बात सुनी और मुस्कुरा दी.

“तुम भी ख़ूब हो. मैंने कहा न कि ख़रीद दूंगी, क्यों, कहा था न? क्या मैं कभी किसी चीज़ से तुम्हें वंचित रख सकती हूं? हरेक के लिए दो-दो? अच्छी बात है. तुम लोग यहीं ठहरो. अभी लेकर आती हूं.”

वह दरवाज़े के पास कुछ दुकानों पर गयी जहां फल और मिठाइयां बिकती थीं.

वहां से लौटकर वह अब फिर अपने बच्चों के बीच आ गयी थी और उनसे कह रही थी,

“यह बहुत ही बढि़या ख़ुशबूदार साबुन तुम्हारे लिए है, वारिया, ज़रा सूंघकर देखो! और यह क़लमतराश चाकू तुम्हारे लिए है, पेत्या! देखा, मैं ज़रा भी नहीं भूली. और ये हैं पूरी एक दर्जन नारंगियां. लेकिन इन्हें एक बार में ही ख़त्म न कर डालना!”

स्टीम-बोट घाट से आ लगा. एक झटका. लोग डगमगा गए. स्त्री ने अपने दोनों बच्चों को समेटकर अपने से चिपका लिया और चौकन्नी आंखों से इधर-उधर देखा. ख़तरे का कोई चिह्न न देख वह हंसी. बच्चे भी हंसे. स्टीम-बोट पर चढ़ने की सीढ़ी लटका दी गयी और लोगों की धारा बोट की ओर बढ़ चली.

“ऐ धीरे-धीरे! धक्का न दो!” पोदशिबलो भीड़ पर चिल्लाया.

“एइयू बेवक़ूफ़!” वह एक बढ़ई पर गरजा जो हथौडि़यों, आरियों, बरमों, रेतियों और अन्य औजारों से लदा-फदा था, “यह क्या कबाड़ उठा लाया है? एक तरफ़ हट और स्त्री को रास्ता दे जो बच्चों को अपने साथ लिए है. ओह, कितना मूर्ख आदमी है.” कहते-कहते उसका स्वर एकदम मुलायम पड़ गया जब वह स्त्री, नीली आंखों वाली उसकी परिचिता, गुज़रते समय उसकी ओर देखकर मुस्कुरायी और बोट पर पहुंच जाने के बाद सिर झुकाकर उसने अभिवादन किया.

तीसरी सीटी.

“रस्से खोल डालो!” कप्तान के मंच से कमान की आवाज़ आयी.

बोट कांपा और हरक़त करने लगा.

पोदशिबलो डेक पर खड़े लोगों में अपनी परिचिता को टोह रहा था और जब वह दिखायी पड़ी तो उसने अपनी टोपी उतार ली और सिर झुकाकर अभिवादन किया.

जवाब में, रूसी ढंग से, वह झुकी और क्रास का चिह्न बनाया.

और इस प्रकार वह तथा उसके बच्चे कोस्त्रमा लौट गए.

उन्हें विदा करने के बाद सहायक पुलिस अफ़सर पोदशिबलो ने एक गहरी उसांस छोड़ी और अपनी ड्यूटी पर लौट आया, भारी उदासी और दुख का अनुभव करते हुए.

Tags: Hindi Literature, Literature and Art, Prostitution, Russia, Ukraine

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