Sunday, July 14, 2024
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कानपुर के फूल बाग में कवि श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ के ‘झंडा-गीत’ पर रीझ उठे थे जवाहरलाल नेहरू

स्वतंत्रता संग्राम में गूंजे देशभक्ति गीत ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा’ के रचनाकार कवि श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ का प्रिय ग्रंथ रामचरित मानस था. कवि होने के साथ वह प्रख्यात रामायणी भी थे और भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को उन्होंने राष्ट्रपति भवन में पूरी रामकथा सुनाई थी. आपको बता दें, कि ‘पार्षद जी’ स्वाधीनता आंदोलन में करीब छ: सालों तक बंदी रहे और उसी दौरान वह जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू और कवि रामनरेश त्रिपाठी से भी जुड़े.

बहुसंख्यक आबादी है, जो ‘पार्षद’ जी के नाम और संघर्षशील जीवन से आज भी परिचित नहीं है. स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर याद किए जाने वाले ‘पार्षद’ जी सारी ज़िंदगी समाजिक कार्यों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते रहे और पूरी ईमानदारी से एक सच्चे देशभक्त की भूमिका निभाई. समाज को बेहतर देने के प्रयास में उन्होंने दोसर वैश्य इण्टर कालेज, अनाथालय, बालिका विद्यालय, गणेश विद्यापीठ, दोसर वैश्य महासभा और वैश्य पत्र समिति की स्थापना और संचालन किया. ‘पार्षद’ जी ने एक और ‘ध्वज-गीत’ लिखा था, जो कुछ ख़ास लोकप्रिय नहीं हुआ. गीत की पंक्तियां कुछ इस तरह थीं-

राष्ट्र गगन की दिव्य ज्योति,
राष्ट्रीय पताका नमो-नमो
भारत जननी के गौरव की,
अविचल शाखा नमो-नमो

‘पार्षद’ जी के एक गीत में कुछ ऐसी पंक्तियां थीं, जिसे लेकर कुछ लोगों ने विरोध ज़ाहिर किया और आकाशवाणी में उनके कविता पाठ को रोक दिया गया. वह विवादास्पद पंक्तियां थीं-

“देख गतिविधि देश की मैं मौन मन में रो रहा हूं
आज चिन्तित हो रहा हूं

बोलना जिनको न आता था, वही अब बोलते हैं
रस नहीं, बस देश के उत्थान में विष घोलते हैं
सर्वदा गीदड़ रहे, अब सिंह बन कर डोलते हैं
कालिमा अपनी छिपाए, दूसरों की खोलते हैं

देख उनका व्यक्तिक्रम, मैं आज साहस खो रहा हूं
देख गतिविधि देश की मैं मौन मन में रो रहा हूं
आज चिन्तित हो रहा हूं…”

आजादी के बाद ‘पार्षद’ जी देश का हाल देखकर काफी दुखी और परेशान थे और उन्हें इस बात की तकलीफ थी, कि उन्होंने जो ‘झंडा-गीत’ लिखा था, देश का विकास उसके बिल्कुल विपरीत हो रहा है. उस समय की सरकार को उनका वह विरोध पसंद नहीं आया जिसके चलते उनके इस गीत को वहीं दबा दिया गया और गीत लोकप्रिय नहीं हो पाया.

उन्नीस साल की उम्र में स्वाधीनता संग्राम में कूदने वाले ‘पार्षद’ जी फतेहपुर जिला कांग्रेस समिति के अध्यक्ष भी बने. असहयोग आंदोलन के दौरान उन्हें क्रांतिकारी घोषित कर आगरा की जेल में भेज दिया गया था. गौरतलब है, कि 1930 में ‘नमक सत्याग्रह’ के दौरान भी उन्हें गिरफ्तार किया गया था. अपने आत्मिक सुख के लिए उन्होंने जिला परिषद के स्कूल में बच्चों को पढ़ाने का काम भी किया, लेकिन उसी दौरान स्कूल में उनसे एक शपथपत्र भरने को कहा गया, जिसमें उन्हें दो साल तक मैनेजमेंट को स्कूल की वह नौकरी न छोड़ने का आश्वासन देना था. ‘पार्षद’ जी को यह बात पसंद नहीं आई और उन्होंने त्यागपत्र (रिज़ाइन) दे दिया. पार्षद जी ने साल 1922 में एक कविता लिखी थी ‘स्वतंत्र भारत’, जिसकी पंक्तियां इस प्रकार हैं-

“महर्षि मोहन के मुख से निकला, स्वतंत्र भारत, स्वतंत्र भारत
सचेत होकर सुना सभी ने, स्वतंत्र भारत, स्वतंत्र भारत
रहा हमेशा स्वतंत्र भारत, रहेगा फिर भी स्वतंत्र भारत
कहेंगे जेलों में बैठकर भी, स्वतंत्र भारत, स्वतंत्र भारत
कुमारि, हिमगिरि, अटक, कटक में, बजेगा डंका स्वतंत्रता का
कहेंगे तैतिस करोड़ मिलकर, स्वतंत्र भारत, स्वतंत्र भारत.”

मन से ‘पार्षद’ जी कवि, लेखक और सच्चे देशभक्त थे, इसलिए स्कूल की नौकरी छोड़ने के बाद वह मासिक पत्र ‘सचिव’ प्रकाशित करने लगे और पत्रिका के हर अंक में मुखपृष्ठ पर उनकी रचना की पंक्तियां लिखी होती थीं, “रामराज्य की शक्ति शान्ति, सुखमय स्वतंत्रता लाने को, लिया ‘सचिव’ ने जन्म, देश की परतंत्रता मिटाने को”. एक समारोह के दौरान कानपुर में ‘पार्षद’ जी ने हिंदी साहित्य के मर्मज्ञ ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी’ के स्वागत में एक कविता पढ़ी, द्विवेदी जी इस कार्यक्रम के अध्यक्ष भी थे. कविता को सुनकर क्रांतिकारी पत्रकार गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ खासा प्रभावित हुए.

गौरतलब है, कि 1923 में उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में कांग्रेस के अधिवेशन में ‘विद्यार्थी जी’ के भाषण से क्षुब्ध होकर अंग्रेजी हुकूमत ने उनको गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया. विद्यार्थी जी जब रिहा हुए तो ‘पार्षद’ जी ने उनके सम्मान में एक कविता पढ़ी, जिसके बाद पार्षद जी और विद्यार्थी जी एक-दूसरे से अभिन्नता से जुड़ गए. यह उन दिनों की बात है, जब कांग्रेस का तिरंगा झंडा तो तय हो चुका था, लेकिन उसके लिए कोई सम्मान-गीत नहीं था. विद्यार्थी जी ने ‘पार्षद’ जी से तिरंगे का ‘झंडा-गीत’ लिखने का आग्रह किया. थोड़े दिन बीत जाने के बाद और व्यस्तता के चलते पार्षद जी समय पर गीत नहीं लिख सके, लेकिन विद्यार्थी जी के याद दिलाने पर ‘पार्षद’ जी ने रातभर में ‘झंडा-गीत’ लिखकर विद्यार्थी जी को दे दिया.

जालियावाला कांड की दुखद स्मृति में पहली बार ‘झंडा-गीत’ 13 अप्रैल 1924 को जवाहर लाल नेहरू की मौजूदगी में कानपुर के फूलबाग मैदान में हज़ारों लोगों के बीच गाया गया. नेहरू जी ने गीत सुनने के बाद कहा था, ‘लोग भले ही श्यामलाल गुप्त को नहीं जानते हैं, लेकिन राष्ट्रीय ध्वज के लिए लिखे इस गीत से अब पूरा देश परचित हो चुका है.’ ‘झंडा ऊंचा रहे हमारा’ गीत स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को कंठस्थ होने के साथ ही पूरे देश में लोकप्रिय हो गया और जब साल 1938 में महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू ने इसे मंच पर गाया, तो ‘पार्षद’ जी खुशी से झूम उठे. देश आजाद होने के कुछ साल बाद ‘पार्षद’ जी ने अपने गांव नरवल में ‘गणेश सेवा आश्रम’ खोला और वह कानपुर शहर से आश्रम हर दिन पैदल जाते थे. 10 अगस्त 1977 को पार्षद जी ने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनका गीत अमर हो गया और सदियों सदियों तक गाया जाएगा.

1973 में ‘पद्म श्री’ से सम्मानित ‘पार्षद जी’ ने अपनी अमर रचना ‘झंडा ऊंचा रहे हमारा’ को 15 अगस्त 1952 को लाल किले से पढ़ा. ‘झंडा-गीत’ नाम से प्रसिद्ध यह कविता इस प्रकार है, जिसे गीत पुस्तिका ‘झंडा ऊंचा रहे हमारा’ में भी शामिल किया गया-

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा

सदा शक्ति बरसाने वाला
प्रेम सुधा सरसाने वाला

वीरों को हर्षाने वाला
मातृभूमि का तन-मन सारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा…

स्वतंत्रता के भीषण रण में
लखकर बढ़े जोश क्षण-क्षण में

कांपे शत्रु देखकर मन में
मिट जाए भय संकट सारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा…

इस झंडे के नीचे निर्भय
लें स्वराज्य यह अविचल निश्चय

बोलें भारत माता की जय,
स्वतंत्रता हो ध्येय हमारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा…

आओ! प्यारे वीरो, आओ!
देश-धर्म पर बलि-बलि जाओ

एक साथ सब मिलकर गाओ,
प्यारा भारत देश हमारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा…

इसकी शान न जाने पाए
चाहे जान भले ही जाए

विश्व-विजय करके दिखलाएं
तब होवे प्रण पूर्ण हमारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा…

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा…

Tags: Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer

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