Thursday, May 23, 2024
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मुंशी प्रेमचंद ने ईश्वर को लेकर कही बड़ी बात- ‘भगवान तो मन का भूत है, जो इन्सान को कमजोर कर देता है’

Munsi Premchand Birth Anniversary: मदन गोपाल चर्चित लेखक और पत्रकार रहे हैं. 22 अगस्त 1919 में हरियाणा के हिसार जिले के हॉंसी में उनका जन्म हुआ था. पत्रकारिता जीवन की शुरूआत उन्होंने लाहौर की सिविल एंड मिलिटरी गजट के संपादन से शुरू की. इसके बाद स्टेट्समैन, नई दिल्ली में लंबे समय तक अपनी सेवाएं दीं. मदन गोपाल प्रकाशन विभाग के निदेशक पद से सेवामुक्त हुए.

मदन गोपाल उन अग्रणी लेखकों में रहे जिन्होंने अंग्रेजी पाठकों को हिंदी लेखकों को परिचित कराने की शुरूआत की. उनका  मदन गोपाल ने 1944 में प्रेमचंद पर अंग्रेजी में एक पुस्तक प्रकाशित की जो उन दिनों प्रेमचंद पर पहली पुस्तक थी. उन्होंने प्रेमचंद के पत्रों को बड़े श्रम से एकत्र किया और दो भागों में ‘चिट्ठी-पत्री’ नाम से प्रकाशित किया.

‘कलम का मजदूर’ पुस्तक के बारे में मदन गोपाल का कहना है कि इस पुस्तक की तैयारी में उन्होंने ‘हंस’ तथा ‘ज़माना’ के प्रेमचंद अंक, शिवरानीदेवी की पुस्तक ‘प्रेमचंद घर में’ तथा कुछ ऐसे निबंध संग्रहों का भी इस्तेमाल किया जिनमें प्रेमचंद की कृतियों पर सामयिक आलोचनाएं छपी थीं. मदन गोपाल बताते हैं कि ‘कलम का मजदूर’ तैयार करने में उपलब्ध तमाम सामग्रियों के अलावा प्रेमचंद की चिट्ठी-पत्रियों का सहारा लिया गया. इसमें प्रेमचंद के वास्तविक व्यक्तित्व को पूरी सच्चाई और ईमानदारी के साथ उभारकर रखने का प्रयास किया गया है. प्रस्तुत है इस पुस्तक का एक अंश-

कलम का मजदूर: प्रेमचंद
प्रेमचंद आदर्शवादी थे. समाज की कुरीतियों को खत्म करना चाहते थे. इन्हीं कमजोरियों ने देश के लोगों को गुलाम बनाया. यदि ये समाप्त हो जाएं तो देश के नागरिकों, विशेषत: गरीबों का स्तर ऊपर उठेगा. यह तो हम देख ही चुके हैं कि गरीबों से प्रेमचंद को विशेष सहानुभूति थी. शिवरानी देवी ने बतलाया है कि उनसे सम्पर्क में आनेवाले छोटे-से-छोटे व्यक्तियों के लिए भी वह सर्वदा भरसक वह सभी-कुछ करते थे जो करना उनके लिए सम्भव होता. चाहे वह कहारी हो, नौकर हो, नाई का कुटुम्ब हो या प्रेस के कर्मचारी हों.
वह स्वयं छोटे समझे जानेवाले लोगों में मिलने का प्रयत्न करते थे. जो मोटा-झोटा मिला, खा लिया; जो साधारण वस्त्र मिले, पहन लिए. जमीन पर बैठकर लिखते थे. सामने डैस्क होता. घर में कोई कुर्सी नहीं थी. कहते— “जिस देश में छ: पैसे रोज की आमदनी हो, वहां लोग कैसे लवाजमात को पूरा कर सकते हैं?” अपने आपको मजदूर समझते और कहते— “मैं कलम का मजदूर हूं और मजदूर को मजदूर का ही जीवन बिताना चाहिए.”

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शिवरानी देवी कहतीं- “विख्यात लेखक हो. घर पर लोग आते हैं उनके बैठने के लिए दो-चार कुर्सियां तो मंगवा लो.” परन्तु प्रेमचंद कहते— “ये सब झंझट की जड़ हैं, विलासिता की निशानी हैं. मेज-कुरसी आ जाएंगी तो तुम एक कालीन के लिए भी कहोगी. कालीन आ जाएगा तो उसकी सफाई के लिए एक नौकर रखना पड़ेगा. एक के बाद दूसरी मांग और मांगों का कायदा है कि वे बढ़ती जाती हैं.”

एक बार साहित्य प्रेमी कालाकांकर नरेश प्रेमचंद के घर पर आए और अगले दिन सवेरे आठ बजे आने का बुलावा दे गए. उनके जाने के बाद शिवरानी देवी को पता लगा कि आगन्तुक व्यक्ति राजा साहब के आदमी नहीं थे, परन्तु स्वयं राजा साहब थे. उन्होंने पूछा- “आपने उन्हें कहां बैठाया?”
प्रेमचन्द- “जहां (जमीन पर) मैं बैठा था.”
शिवरानी देवी- “उन लोगों ने क्या सोचा होगा?”
प्रेमचंद- “तो मैं राजा लोगों के लिए थोड़े ही इन्तजाम करता हूं. मेरी गद्दी तो जमीन है. उनको अच्छा न लगे तो इसके लिए मैं क्या करूं?”

बात से बात निकली. स्वराज्य मांगनेवालों के रहन-सहन का जिक्र आया.

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शिवरानी देवी- “ये मेज-कुर्सीवाले ही तो स्वराज्य मांग रहे हैं. स्वराज्य की मांग गरीबों के दिमाग की उपज तो नहीं है.”
प्रेमचन्द- “जब स्वराज्य मिलेगा तो सबका कल्याण हो जाएगा. उनका भला तभी होगा जब उनमें शक्ति आएगी.”
शिवरानी देवी- “भगवान को चाहिए कि उन गरीबों में ताकत भरे.”
प्रेमचन्द- “भगवान तो मन का भूत है, जो इन्सान को कमजोर कर देता है. दुनिया स्वावलम्बी पुरुषों की है. अंधविश्वास में पड़कर हमारी रही-सही बुद्धि भी मारी जाती है.”
शिवरानी देवी- “परन्तु गांधीजी तो दिन-रात ईश्वर-ईश्वर चिल्लाते रहते हैं.”
प्रेमचन्द- “वह एक प्रतीक-भर है. वे देख रहे हैं कि जनता अभी बहुत सचेत नहीं है और फिर जो जनता सदियों से भगवान पर विश्वास किए चली आ रही है, वह (कैसे) एकाएक अपने विचार बदल सकती है? अगर एकाएक जनता को कोई भगवान से अलग करना चाहे तो सम्भव भी नहीं है. इसी से वे भी शायद भगवान का ही सहारा लेकर चल रहे हैं.”
शिवरानी देवी- “आप भले ही न मानें, दुनिया थोड़े ही नास्तिक हो सकती है.”
प्रेमचन्द- “मेरा कहना झूठ नहीं है. तुम सच मानो, जो भी आज धर्म के नाम पर हो रहा है, सब अंधविश्वास है. यह सब मूर्खों के बहकाने के तरीके हैं. पुरुषों ने भी अंधविश्वास द्वारा स्त्रियों को मूर्खता का पाठ पढ़ाया है.”

फर्नीचर से लेकर बात आस्तिकता तक जा पहुंची, परन्तु यह तो कोई नई बात न थी. प्रेमचंद ने कुर्सियां मंगाने की स्वीकृति नहीं दी. परन्तु शिवरानी देवी ने पचास रुपए का फर्नीचर मंगवा ही डाला. कमरा सजा दिया गया. प्रेमचंद के लिए यह एक प्रकार की मुसीबत हो गई. स्वयं तो जमीन ही पर बैठते, परन्तु फर्नीचर की सफाई करने लगते. शिवरानी देवी अपने दिल में सोचतीं- “मैंने नाहक फर्नीचर मंगवाकर उनकी बला बढ़ा दी, झाड़ने-पोंछने में उनका वक़्त खराब होने लगा.”

ऊपर दिए गए वृत्तान्त से प्रेमचंद के जीवन की सरलता का तो पता चलता ही है, साथ ही हमें इस बात का प्रमाण भी मिलता है कि वे अपने जीवन को गरीबों के जीवन के नजदीक लाना चाहते थे.

पुस्तक- कलम का मजदूरः प्रेमचंद
लेखक- मदन गोपाल
प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन

Tags: Books, Hindi Literature, Hindi Writer, Literature

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