Thursday, May 23, 2024
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‘महासंभोग’ के बाद ‘शिव की छाती पर काली का पांव’ तक सिर्फ प्रेम में डूबा काफ़िर

Book Review: राधाकृष्ण प्रकाशन से आई कविताओं की छोटी किताब ‘शिव की छाती पर काली का पांव’ पहली ही नजर में ध्यान खींचती है. कविता संग्रह की शीर्षक तो अलग हटकर ही है, साथ ही इसका कवर भी बहुत ही आकर्षक है. और कवर पर नजर जहां ठहरती है वह लेखक का नाम- काफ़िर. ‘काफ़िर’ इस्लाम में अरबी भाषा का बहुत विवादित शब्द है. इस्लाम को जो न मानतो वह काफ़िर कहलाता है. और निश्चित ही इस्लाम के मुताबिक, वह काफ़िर ही है जो शिव और काली की बात कह रहा है.

खैर, कवर से हटकर जब अंदर के पन्ने पर लेखक का परिचय पढ़ा तो पता चला कि पंजाब के भूपिंदर सिंह संगरूर के रहने वाले हैं और काफ़िर नाम से कविता-कहानी आदि लिखते हैं. पटियाला में पंजाब यूनिवर्सिटी से दर्शनशास्त्र में पीएच.डी. हासिल करने वाले काफ़िर साहब को सिनेमा, चित्रकला और अन्य कला विधाओं में खासी रुचि है. पंजाबी में उनका कहानी संग्रह ‘महासंभोग’ प्रकाशित हो चुका है. आपने पाब्लो नेरूदा की ‘सवालों की किताब’ का पंजाबी में तर्जुमा किया है.

अब बात ‘शिव की छाती पर काली का पांव’ संग्रह की कविताओं की. निश्चित ही छोटी-छोटी 5-6 लाइनों की कविताएं अपने अंदर एक असीम गहरा अर्थ समेटे हुए हैं. शायद ही ऐसा कोई विषय या व्यथा रही हो जो इनसे अछूता रही हो.

प्रसिद्ध रचनाकार बाबुसा कोहली काफ़िर की कविताओं पर टिप्पणी करते हुए लिखती हैं- “काफ़िर की कविताओं में महज प्रेम नहीं है, बल्कि एक पक्के प्रेमी की तरह तबाह हो जाने की पर्याप्त चाह भी है. इस जटिल संरचना वाले अंधकारपूर्ण संसार में उनकी कविताओं का प्रेमी ऐसा प्रतीत होता है मानो बिना बिजली वाले किसी गांव में अमावस की तिथि पड़ी हो और सुदूर आकाश में सितारे जगमगा रहे हों.”

निश्चित ही काफ़िर की कविताएं जहां तमाम तरह के सवाल खड़े करती हैं वहीं इस सवालों से जूझते हुए आशा की किरण बनकर भी दिखलाई पड़ती हैं.

बाबुसा लिखती हैं- इस दौर में प्रेम की कविता एक बड़ी चुनौती से जूझ रही है. प्रेम की अभिव्यक्ति में भावों की तीव्रता को गती की तीव्रता ने विचलित किया है. ऐसे में काफ़िर की कविता में व्याप्त तीव्र भावनात्मक संवेग और निर्वाण की अवस्था के प्रति मद्धम आसक्ति एक तरह का विरोधाभासी दृश्य रचते हैं. नए-नए उपमान या बिम्बों से विस्मय जगाने वाली तकनीक नहीं, बल्कि उपरोक्त विरोधाभास के आंतरिक संघर्ष से उपजा धैर्य काफ़िर की कविताओं की प्राणवायु है.

काफ़िर की हर कबिता एक नया बिम्ब प्रदान करती है. इसकी बानगी यहां देखी और महसूस की जा सकती है-

उफनती नदी तैरना नहीं
डूबना सिखाती है।
किनारे पर पहुंचना कायरों का काम है।
नाव-
एक सहमे हुए आदमी की ईजाद।

डूबना ही जीवन है. काफ़िर किनारे पर पहुंचने के बजाय डूबने की बात कहते हैं. अमीर खुसरो साहब ने भी डूबने की बात कही है- “खुसरो दरिया प्रेम का सो उल्टी वाकी धार! जो उबरा सो डूब गया, जो डूबा वो पार

कवि बिहारी भी लिखते हैं- “या अनुरागी चित्त की गति समझे न कोय, ज्यों ज्यों बूड़े श्याम रंग, त्यों त्यों उज्ज्जल होय.
प्रेम की दशा ही कुछ ऐसी ही है कि उसमें डूबना पड़ता है. किनारे-किनारे रहने पर प्रेम को पाया नहीं जा सकता है. काफ़िर भी अपनी कविताओं में हमारे पूर्वजों का अनुसरण करते हुए कहते है-

वो तप कर सकती थी
एक पैर पर खड़ी रह कर।
सिर मुंडवाकर
भिक्षुणी हो सकती थी।

उसे पता थे तैरने के सारे करीने लेकिन
वो डूब गई कश्ती हाथ में लिए
एक अबोध समंदर में।

काफ़िर की कविताएं सवाल तो खड़े करती हैं, लेकिन निराश नहीं करती हैं. वे इनसान के जिंदा रहने को तरजीह देते हैं. क्योंकि अगर इनसान जिंदा है तो वह तमाम संकटों के बाद भी कुछ ना कुछ रच ही लेगा.

पिछली दफा
मैं तब पूरी तरह से पैदा नहीं हुआ था
तुम भी अभी अंडे में ही थीं
उस जानवर की तरह
जिसे निकलते ही उसकी मां खाना शुरू कर देती है
लेकिन गनीमत है, तुम जिंदा हो

सो ये तैय रहा
कि अभी कुछ संभावना है।

प्रेम में गुंजाइश हमेशा बनी रहती है. जब हम प्रेम में होते हैं तो हमें हर चीज से मोह हो जाता है. हम कुदरत और इनसान की प्रत्येक रचना को महसूस करते हुए उससे गुजरते हैं. प्रेमी भले ही किसी की चाह में सुध-बुध खोकर डूबा रहे, लेकिन उसे एक नई दुनिया का बोध होता है. इस बात को काफ़िर ने बड़ी सुंदरता से अपनी कविता में प्रस्तुत किया है-

तुम्हें प्रेम करते हुए-
मैं जान पाया
उस छोटी चिड़िया का नाम
जो हमारे पुश्तैनी घर के बागीचे में
मेरे बचपन के दिनों से
गमले में लगे पौधे पर आकर बैठती थी,

मैं जान पाया
बहुत से फूलों के खिलने का
सही समय
सही गंध
सही रंग।

कितनी सुंदर बात यहां वे लिखते हैं-
विष पीने के बाद शिव मरते नहीं,
ना मीरा।
ना दोनों थकते हैं
नाचते-नाचते।

काफ़िर ने शिव, मीरा बुद्ध के माध्यम से प्रेम को एक अलग दृष्टि से देखने का प्रयास किया है. इस संग्रह में ऐसी कितनी ही कविता हैं जो शिव, मीरा और भगवान बुद्ध को केंद्र में रखकर लिखी गई हैं. इनके माध्यम से प्रेम के महत्व को जिस नाजुकता के साथ वे यहां रखते हैं, ये कोशिश वाकई काबिल-ए-तारीफ है. प्रेम में मगन होकर प्रेमी केवल नाचता है. अपना सब कुछ विसार कर. जैसे मीरा नाचती है अपने गोविंद के प्रेम में दीवानी होकर. लेखक अपनी रचनाओं के माध्यम से संदेश देते हैं कि मानवता को बचाए रखने के लिए किसी उपदेश, संदेश या किसी अनुसंधान की जरूरत नहीं है. जरूरत है तो सिर्फ..और सिर्फ प्रेम की. क्योंकि प्रेम के लिए ना तो कहीं जाना पड़ता है और ना ही कहीं से लौट कर आना पड़ता है-

महावीर भी, बुद्ध भी
यहां तक कि लल्ला भी
चले जाते हैं जंगल की तरफ
बुद्ध लौट आते हैं वापिस
बस्ती में
बौद्ध के पश्चात

मगर मीरा नहीं भागती
वो जहां है वहीं नाचने लगती है

नानक यात्रा करते हैं
जहां तक कर सकते हैं
समझाते हैं
जितनों को समझा सकते हैं
फिर लौट आते हैं घर
और अपने अंतिम सतरह बरस
सिर्फ धरती के एक छोटे से टुकड़े पर अन्न उगाते हैं।

लेकिन मीरा
यात्रा नहीं करती
जंगल नहीं जाती
समझाती नहीं
वो महज नाचती है
गाती है।

प्रेम के आगे बड़े से बड़ा ज्ञान की बौना साबित हो जाता है. प्रेम का रास्ता कठीन जरूर है लेकिन उसके आगे तमाम वैभव फीके हो जाते हैं. कृष्ण के प्रेम में पड़ी गोपियों के आगे तो उद्धव भी अपना ज्ञान भूल जाते हैं. प्रेम रस तो गूंगे के लिए गुड़ का वह स्वाद है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है, बयां नहीं.

जमीन पर बिना एक कदम रक्खे
मैं पूरी करता हूं
एक महायात्रा
बिना भीगे
मैं तैरकर पार कर जाता हूं
दुनिया की सबसे चौड़ी नदी।

बहुत बोलता हूं
लेकिन बात नहीं करता।

नाजिम हिकमत कहता है-
तुम्हें प्यार करना
नमक चुपड़ी रोटी खाने जैसा है।

वाकई काफ़िर की तमाम कविताएं, कविता ना होकर पन्नों पर हिलोरे मारते हुए प्रेम की लहरे हैं, पाठक इनमें डूबता ही चला जाता है, खुद को भूल कर. अंत में इस निवेदन के साथ आपको काफ़िर की कविताओं के साथ बेमन से छोड़ चलते हैं-

प्रेमिकाओं!
शादीशुदा औरतों!
बचना फर्जी पैगम्बरों से।

माओ!
बेटियों से मत कहना
चांद के दागों को गड्ढे,
उन्हें चुम्बनों के निशान ही रहने देना
सागर की लहरों के।

पिताओ!
मसीहाई छोड़ देना
ताकि तुम्हारी बेटी
तुम्हारे नाम पर
रख सके अपने प्रेमी का नाम।

पुस्तकः शिव का छाती पर काली का पांव (कविता संग्रह)
लेखकः काफ़िर
प्रकाशकः राधाकृष्ण प्रकाशन
मूल्यः 150 रुपये

Tags: Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer, Literature

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