Thursday, June 13, 2024
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उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खां: ट्रेन में गुमनाम बालक ने सिखाया था एक राग

बना रहे रस और बना रहे बनारस. बनारस यानी बाबा विश्‍वनाथ की नगरी. बनारस यानी गंगा की नगरी. बनारस यानी उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खां की नगरी. बाबा विश्‍वनाथ, गंगा के प्रवाह और बिस्मिल्‍लाह खां की शहनाई की सुर लहरियों के बिना बनारस में ‘रस’ नहीं है. बिस्‍मिल्‍लाह खां बाबा विश्‍वनाथ मंदिर की चौखट पर तो गंगा किनारे शहनाई बजाया करते थे. छह बरस की उम्र में बनारस आए बिस्मिल्‍लाह खां 90 वर्ष की उम्र में इस दुनिया को छोड़ कर गए. उम्र के इस विस्‍तार के बीच वे तब ही शहर से बाहर गए जब जाना अपरिहार्य हो गया. अन्‍यथा तो बनारस में ही उनका मन रमा और यही जीने में रस आया.  वे थे तो बनारस में रस था. उनके न होने से गंगा घाट के सुर अनमने से रहते हैं.

शहनाई के उस्‍ताद बिस्मिल्लाह खां साहब की 21 अगस्‍त को पुण्‍यतिथि है. उनका जन्‍म बिहार के डुमरांव गांव में 21 फरवरी 1916 को हुआ था. छह साल के बिस्मिल्‍लाह को शिक्षा लेने के लिए मां ने पैतृक गांव डुमराव (बिहार) से बनारस मामू के पास भेज दिया था. मामू अली बख्श ‘विलायती’ काशी विश्वनाथ मंदिर के अधिकृत शहनाई वादक थे. उनकी संगत में बिस्मिल्‍लाह ने किताबी शिक्षा तो नहीं ली लेकिन संगीत की तालीम लेनी शुरू कर दी. पहले पहल थोड़ी कठिनाई हुई फिर एक घटना घटी. खां साहब बताया करते थे कि जब वे आठ साल के थे तब बालाजी के मंदिर में शहनाई का रियाज किया करते थे. एक दिन उन्‍होंने 2 घंटे तक शहनाई बजाई. बजाते हुए वे इतने तन्मय हो गए कि जब आंख खुली तो सामने स्वामी जी खड़े मुस्करा रहे थे. उन्होंने बालक बिस्मिल्‍लाह की पीठ थपथपाई. जब तक बालक बिस्मिल्‍लाह कुछ समझ पाते वे आंखों से ओझल हो गए. बिस्मिल्‍लाह उन्‍हें खोजने भागे लेकिन वे कहीं नहीं मिले. जब उन्‍होंने यह बात अपने उस्ताद और मामू को बताई तो कहा तुम बड़े नसीबवान हो. अपने आपको शहनाई के नाम कर दो. तब से शहनाई बिस्मिल्‍लाह का पहला प्‍यार हो गई. उन्‍होंने शहनाई वादन में कई नवाचार किए. ‘कजरी’, ‘चैती’ और ‘झूला’ जैसी लोक धुनों को प्रस्तुत किया तो ‘ख्याल’ और ‘ठुमरी’ जैसी शास्‍त्रीय शैलियों को भी बजाया.

बचपन की तरह ही दैवीय संकेत मिलने की कई घटनाएं उनके साथ हुईं. एक मुलाकात तो एक ऐसे राग के बनने का सबब बनी जिसे राग कन्‍हैरा या राग बिस्‍मिल्‍लाह खां कहा जाता है. उस्ताद बिस्मिल्लाह खां ने मलयाला मनोरमा दैनिक के डॉ. मधु वासुदेवन को साक्षात्कार में यह वाकया बताया था. मामला कुछ यूं है कि उस्ताद बिस्मिल्लाह खां कुंभ मेले में आयोजित संगीत समारोह में भाग लेने के लिए बनारस जा रहे थे. वे जमदशेदपुर से ट्रेन में सवार हुए. उस्ताद कोयले से चलने वाली यात्री ट्रेन की तीसरी श्रेणी के डिब्बे में यात्रा कर रहे थे. उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खां जिस बोगी में बैठे थे उसमें एक ग्रामीण रेलवे स्टेशन से एक चरवाहा लड़का चढ़ा. उस्‍ताद बताते हैं कि वह लड़का दुबला और काला था और उसके हाथ में बांसुरी थी. धीरे-धीरे लड़के ने बांसुरी बजाना शुरू की. उसका नैसर्गिक संगीत कौशल देख खां साहब दंग रह गए. वे संगीत के उस्‍ताद थे लेकिन उस लड़के द्वारा बजाए जा रहे राग को पहचान नहीं पाए. उसकी बांसुरी से निकले सुर से उस्‍ताद सम्‍मोहित हो चुके थे. उन्हें अलौकिक अनुभव हो रहा था, मन गद्गद था और आंखों से अश्रु बह रहे थे.

सुर थमे तो जैसे आकाश से धरती पर आ गए. वादन खत्‍म हो गया था मगर भीतर असीम शांति महसूस हो रही थी लेकिन आत्‍मा तृप्‍त नहीं हुई. उस्‍ताद ने उस बालक को पास बुला कर एक सिक्‍का दिया और फिर से वही राग बजाने को कहा. उस्‍ताद एक-एक सिक्‍का देते रहे और वह राग बजाता रहा. यह क्रम तब तक चला जब तक उस्‍ताद बिस्मिल्लाह खां का बटुआ भरा रहा. वह लड़का अगले स्‍टेशन पर उतर गया.
बनारस की संगीत सभा में उस्ताद बिस्मिल्‍लाह खां ने वही ‘राग’ बजाया जो उन्‍होंने ट्रेन में युवक से सुना था. उस महफिल के श्रोता भी उस राग के प्रभाव में खो गए. जब संगीत साधकों ने इस राग का नाम पूछा तो बिस्मिल्लाह खां ने बता दिया राग ‘कन्हैरा’. उस्‍ताद का कहना था कि वह बालक कोई और नहीं साक्षात् कृष्‍ण थे. इसलिए उस बालक द्वारा बजाए गए राग का नाम कन्‍हैया के नाम पर कन्‍हैरा रख दिया. बाद में जब प्रख्‍यात बांसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया ने बिस्मिल्लाह खां से ‘कन्हैरा राग’ का विवरण पूछा तो उस्ताद ने घटना कह सुनाई. कन्‍हैरा राग सुन कर पं. हरिप्रकाश चौरसिया का मन भर आया और आंखें छलछला गई.

उस्ताद बिस्मिल्लाह खां ने फिल्‍मों में संगीत के कई प्रस्‍ताव ठुकराए मगर अपने मित्र विजय भट्ट की शहनाई पर केंद्रित फिल्‍म ‘गूंज उठी शहनाई’ में संगीत जरूर दिया. उस्‍ताद को विदेशों से कई कार्यक्रमों के प्रस्‍ताव मिलते थे मगर बनारस और गंगा से वे अधिक समय दूर नहीं रह पाने के कारण वे जाने से इंकार कर देते थे. एक बार अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय ने संगीत सिखाने का आमंत्रण दिया तो प्रस्‍ताव दिया कि खां साहब को अकेलापन महसूस न हो इसके लिए वे अपने कुछ करीबियों को भी शिकागो बुलवा सकते हैं. लेकिन खां साहब ने जाने से इंकार कर दिया. विश्वविद्यालय में उनके निवास के आसपास बनारस जैसा माहौल बना कर रखने की बात कही गई तब भी खां साहब ने अपने उत्‍तर से लाजवाब कर दिया. उन्होंने कहा, ‘ये तो सब कर लोगे. ठीक है मियां! लेकिन मेरी गंगा कहां से लाओगे?’

जब उनसे पूछा गया कि बनारस में क्‍या रस तो वे कहते हैं, बनारस तो बनारस है. बनारस को आप ध्‍यान से देखेंगे तो पाएंगे कि यहां की आबो हवा में ‘बना’ बनाया ‘रस’ है. जनाब यह बनारस हैं! अपने शहर का प्‍यार उनके दिल में धड़कनों की तरह था, और गंगा जैसे रक्‍त बन रगों में दौड़ा करती थी. यह प्‍यार और रियाज का यह रक्‍त उनके वादन में मिठास बन समाया रहता था. यही कारण है कि मशहूर शास्त्रीय गायिका और खान साहब की मुंह बोली बेटी डॉ. सोमा घोष कहती हैं, ‘बाबा दूसरे संगीतकारों से अलग शुरुआत करते थे. वे सुरों को ऐसे घुमाते थे जैसे इतराती गंगा की लहरें मुड़ती हैं.’

जब देश के स्‍वतंत्र होने का ऐतिहासिक पल आया तो उस जश्‍न के पल में शहनाई गूंजी थी, उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खां की शहनाई. प्रथम गणतंत्र दिवस 26 जनवरी 1950 के दिन लाल किले का जश्न भी खां साहब की शहनाई के सुरों से खनक उठा था. उसके बाद लगभग हर साल, लाल किले से उनकी शहनाई की मधुर तान के साथ ही स्वाधीनता दिवस मनाने का रिवाज सा शुरू हो गया. पहले गणतंत्र दिवस के संगीत समारोह की यादें ताजा करते हुए खां साहब ने बताया था कि उस दिन मैं जीवन की सबसे यादगार शहनाई बजाने वाला था. पं. नेहरू के बारे में मेरे मन में बड़ा आकर्षण था. मंच पर यदाकदा वे मेरी ओर देख रहे थे. मैं बार–बार उनकी ओर देखता था. मुझे ऐसा आभास हुआ कि वे बगल वाले व्यक्ति से शायद मेरे बारे में ही कुछ कहकर एक शानदार ठहाका लगा गए. मैं इस बात को पूरे कार्यक्रम में महसूस करता रहा. कार्यक्रम खत्म होते ही पं. नेहरू से मुलाकात तो हुई पर मैं उनसे कुछ पूछ नहीं सका, लेकिन जिस व्यक्ति के साथ उन्होंने ठहाका लगाया था, मैं उन तक पहुंचा. वे महेंद्र सिंह बेदी थे. मैंने अपने मन की बात उनसे पूछी तो उन्होंने उतनी ही ताजगी के साथ मुझे बताया कि नेहरू जी कह रहे थे, देखिए न कितना शानदार दिन है आज. हमारे गणतंत्र की अभी-अभी शुरूआत हो रही है और आज इस कार्यक्रम की शुरूआत भी ‘बिस्मिल्लाह’ से हो रही है.

संगीत साधना के लिए उन्‍हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1956), पद्मश्री(1961), तानसेन(1965), पद्मभूषण(1968), सोवियत लैंड पुरस्कार(1973), पद्मविभूषण(1980), भारत शिरोमणि पुरस्कार(1994), विशिष्ट पंत पुरस्कार(1995), राष्ट्रीय संगीत रत्न पुरस्कार(1996) और 2001 में भारत का सर्वोच्च अलंकरण ‘भारत रत्न’ से सम्‍मानित किया गया.

उन्‍होंने एक साक्षात्‍कार में कहा था कि यह दुनिया एक अजीब मुकाम पर खड़ी है, भाई-चारे की जगह एक-दूसरे के प्रति बैर है. पर मेरा तो मानना है संगीत सीखेंगे तो सारे झगड़े ही खत्म हो जाएंगे. संगीत सुनेंगे तो झगड़े के लिए समय नहीं मिलेगा. संगीत, संवाद का बेहतरीन साधन है. अब सोचिए न हम इस दुनिया से क्या लेकर जाएंगे, जितने दिन हम यहां हैं, हमें एक–दूसरे की बेहतरी के लिए काम करना चाहिए. संगीत में सब कुछ है. मन की शांति, भीतरी ऊर्जा, जीने की ललक और समस्या को सुलझाने की ताकत भी संगीत में हैं. आज बनारस का यह सुरीला बेटा नहीं है लेकिन उनका संदेश है कि जीवन में संगीत की जगह बनी रहे. संगीत बना रहेगा तो द्वेष, नफरत, हिंसा जैसे भावों को जगह नहीं मिलेगी.

Tags: Banaras, Classical Music, Music

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