Thursday, May 23, 2024
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Luna-25 vs Chandrayaan-3: शॉटकर्ट अपनाने से फेल हुआ रूस का लूना-25? चंद्रयान-3 की लैंडिंग को लेकर कितना अलर्ट है इसरो

नई दिल्ली. रूस के लूना-25 अंतरिक्ष यान का चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने का सपना टूट चुका है क्योंकि उसका मानवरहित रोबोट लैंडर कक्षा में अनियंत्रित होने के बाद चंद्रमा से टकरा गया था. इस अंतरिक्ष यान को 21 अगस्त को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरना था. इसकी प्रतिस्पर्धा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के चंद्रयान-3 से थी जिसे 23 अगस्त को चंद्रमा की सतह पर उतरना है.

रूसी अंतरिक्ष एजेंसी ‘रोसकॉसमॉस’ ने बताया था कि उनका लैंडर एक अप्रत्याशित कक्षा में चला गया और चंद्रमा की सतह से टकराने के परिणामस्वरूप क्षतिग्रस्त हो गया. इसने कहा कि यान में चंद्रमा पर उतरने से पहले की कक्षा में भेजने के बाद समस्या आई और शनिवार को उससे संपर्क टूट गया. रूस ने 1976 के सोवियत काल के बाद पहली बार इस महीने की शुरुआत में अपना चंद्र मिशन भेजा था.

यान के दुर्घटनाग्रस्त होने की खबर आने से पहले रोसकॉसमॉस ने शनिवार को जानकारी दी थी कि ‘असमान्य परिस्थिति’ उत्पन्न हो गई है और विशेषज्ञ समस्या का विश्लेषण कर रहे हैं. रोसकॉसमॉस ने टेलीग्राम पोस्ट में कहा था, ‘अभियान के दौरान स्वचालित स्टेशन पर असमान्य परिस्थिति उत्पन्न हुई जिसकी वजह से विशिष्ट मानकों के अनुसार मार्ग में तय बदलाव नहीं किया जा सका.’

भारत और रूस दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला पहला देश बनने की होड़ में थे. रूस का यान अब दुर्घटनाग्रस्त हो चुका है और भारत के लोगों को 23 अगस्त को इस दौड़ में अपने देश के सफल होने की उम्मीद है. वर्ष 2019 में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने का पिछला भारतीय प्रयास तब असफल हो गया था जब लैंडर चंद्रमा की सतह पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. रूस ने 10 अगस्त को लूना-25 अंतरिक्ष यान का प्रक्षेपण किया था.

चांद तक पहुंचने की तकनीक में बड़ा अंतर
दोनों मिशन के अलग-अलग पहुंचने के समय का एक प्रमुख कारक उनका संबंधित द्रव्यमान और ईंधन दक्षता था. लूना-25 का भार केवल 1,750 किलोग्राम था, जो चंद्रयान-3 के 3,800 किलोग्राम से काफी हल्का था. भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो के अनुसार यह कम द्रव्यमान लूना-25 को अधिक प्रभावी ढंग से आगे बढ़ने में सक्षम बनाता है. इसके अलावा, लूना-25 का अधिशेष ईंधन भंडारण ईंधन दक्षता संबंधी चिंताओं को दूर करता है, जिससे यह अधिक सीधा मार्ग अपनाने में सक्षम होता है.

इसके विपरीत, चंद्रयान-3 की ईंधन वहन क्षमता के अवरोध के कारण चंद्रमा तक अधिक घुमावदार मार्ग की आवश्यकता है. चंद्रयान की कक्षा को चरणबद्ध तरीके से बढ़ाया गया था. यह प्रक्रिया प्रक्षेपण के लगभग 22 दिन बाद चंद्रमा की कक्षा में खत्म हुई. वैज्ञानिकों ने कहा कि अंतरिक्ष यान लैंडिंग के समय को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक आकाश में सूर्य का मार्ग है. यानों को जिस मार्ग से गुजरना है, वहां सूर्य का उगना आवश्यक है.

क्यों अहम चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव
चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव को लेकर वैज्ञानिकों की विशेष रुचि है जिसके बारे में माना जाता है कि वहां बने गड्ढे हमेशा अंधेरे में रहते हैं और उनमें पानी होने की उम्मीद है. चट्टानों में जमी अवस्था में मौजूद पानी का इस्तेमाल भविष्य में अंतरिक्ष यात्रियों के लिए वायु और रॉकेट के ईंधन के रूप में किया जा सकता है. चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव अपने संभावित जल संसाधनों और अद्वितीय भूवैज्ञानिक विशेषताओं के कारण विशेष रुचि जगाता है. अपेक्षाकृत अज्ञात क्षेत्र भविष्य के चंद्र मिशन के लिए महत्वपूर्ण है, जिसमें अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का आगामी आर्टेमिस-तीन मिशन भी शामिल है, जिसका उद्देश्य पांच दशक के अंतराल के बाद मानव को चंद्रमा पर ले जाना है.

चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करने में 3 देश सफल, लेकिन…
केवल तीन देश चंद्रमा पर सफल ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ करने में सफल रहे हैं, जिनमें पूर्ववर्ती सोवियत संघ, अमेरिका और चीन शामिल हैं. हालांकि, ये तीनों देश भी चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर नहीं उतरे थे.

भारत और रूस दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला पहला देश बनने की होड़ में थे. रूस का यान अब दुर्घटनाग्रस्त हो चुका है और भारत के लोगों को 23 अगस्त को इस दौड़ में अपने देश के सफल होने की उम्मीद है.

Tags: Chandrayaan-3, ISRO, Russia

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